गरीबी के खिलाफ और हाशिये पर पड़े लोगों को सशक्त करने के लिए जंग छेड़ने की जरूरतः मनोज झा

नई दिल्ली, 3 अप्रैल (हि.स.)। राज्यसभा में गुरुवार को वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 पर चर्चा में भाग लेते हुए राजद के प्रो. मनोज कुमार झा ने कहा कि आज हमें ज्यादा जरूरत गरीबी के खिलाफ और हाशिये पर पड़े लोगों को सशक्त करने के लिए जंग छेड़ने की है।
प्रो. झा ने कहा कि पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू यादव के एक पुराने बयान को कल से सोशल मीडिया और मीडिया में प्रसारित किया जा रहा है। हालांकि, इससे अधिक संख्या में उनके सांप्रदायिक एकता के बयान हैं लेकिन उन बयानों को तवज्जो नहीं मिल रही है। उन्होंने कहा कि चुनाव में बहुमत मिलना बुद्धिमत्ता की गारंटी नहीं होता है। आए दिन कभी-कभार पूजा स्थलों पर सवाल उठता है। खान, पान, पूजा, इबादत पर इतनी तकरार क्यों है? हम समुदायों को लगातार हाशिए पर छोड़ रहे हैं। उन्होंने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह का जिक्र करते हुए कहा कि उसके पात्र हामिद ने दादी के लिए चिमटा खरीदा था लेकिन उन्होंने नहीं लिखा कि वह किस जाति या मजहब वाले की दुकान से खरीदा। आज इस देश में दुकानदारों को मजहबी आधार पर चिह्नित किया जाता है। इस देश के लोगों को एक दूसरे धर्म और संप्रदाय के अनुयायियों के साथ रहने की आदत हैं। उन्हें अलग मत कीजिए।
उन्होंने कहा कि कल मैं गृहमंत्री को सुन रहा था, जिन्होंने बहुत अच्छी तरह से वक्फ का स्रोत बताया। वक्फ फारसी का शब्द है, जिसका मतलब पवित्रता से है। काबा की मस्जिद वक्फ का पहला निर्माण है। इस बिल में बाबा साहब डा. आंबेडकर को उपेक्षित किया गया। जमीन के साथ किसी व्यक्ति या कौम का क्या रिश्ता होता है, इसे भी समझने की जरूरत होती है। मुसलमानों के घर तोड़ना और उन्हें घुसपैठिया बताना ठीक नहीं है। इस देश में इतना धर्म निरपेक्षता कर दीजिए की एक दूसरे की संस्थाओं में दूसरे धर्म के लोग हों।
प्रो. झा ने कहा कि किसी भी समुदाय की एक स्मृति होती है। कोई मस्जिद कब अस्तित्व में आई, उसके रिकार्ड ढूंढो। पूरे समुदाय को कठघरे में खड़े करने से लिटिगेशन का पहाड़ खड़ा हो जाएगा। जिला कलेक्टर को जिस तरह दायित्व दिए जा रहे हैं, उसके पास मीटिगों का टाइम ही नहीं होता। जब हम कहते हैं कि जातिगत जनगणना करवा दीजिए। आरक्षण क्यों नहीं दिया जाए? पूजा पद्धति क्यों एक ही जाति के पास हो? आप सुनते नहीं, सिर्फ सुनाते हैं, इसे संवाद नहीं कहते हैं। संवाद दो-तरफा होता है। मैं आग्रह करता हूं कि जल्दबाजी मत कीजिए। इस देश की मिट्टी का मुसलमानों पर कर्ज है और मुसलमानों का इस देश की मिट्टी पर कर्ज है।
उन्होंने चर्चा का समापन आदम गोंडवी की इस कविता के साथ किया- हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है/ दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए/ ग़र ग़लतियां बाबर की थीं, जुम्मन का घर फिर क्यों जले/ ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए/ हैं कहां हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ां/ मिट गए सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िए/ छेड़िए इक जंग, मिल-जुल कर ग़रीबी के ख़िलाफ़/ दोस्त, मेरे मज़हबी नग्मात को मत छेड़िए।
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हिन्दुस्थान समाचार / दधिबल यादव