विधानसभा चुनाव से पहले पहाड़ में फिर से पृथक गोरखालैंड की सुगबुगाहट
सिलीगुड़ी, 11 अप्रैल (हि.स.)। गोरखालैंड मुद्दे को लेकर एक बार फिर पहाड़ की राजनीति गरमा गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोलकाता में बीजेपी का संकल्प पत्र जारी करते हुए साफ कहा कि “बंगाल की एकता बनाए रखते हुए पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याओं का संवैधानिक समाधान खोजा जाएगा।”
इस बयान के बाद पहाड़ के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (बीजीपीएम) ने दावा किया कि बीजेपी कभी भी अलग गोरखालैंड राज्य के पक्ष में नहीं थी और चुनाव के समय लोगों को भ्रमित किया गया। वहीं गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के नेता रोशन गिरी ने कहा कि बीजेपी ने हमेशा संवैधानिक समाधान की बात ही की है, अलग राज्य की नहीं।
उधर, तृणमूल कांग्रेस नेता उदयन गुहा ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी ने लंबे समय तक पहाड़ के लोगों को गुमराह किया और अब सच्चाई सामने आ रही है।
उल्लेखनीय है कि गोरखालैंड की मांग करीब सौ साल पुरानी है, जो केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि पहाड़ के लोगों की भावनाओं से जुड़ा विषय भी है। 1980 के दशक में इस आंदोलन में कई लोगों की जान गई थी। इसके बाद सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) का गठन हुआ।
2007 में बिमल गुरुंग के नेतृत्व में फिर से गोरखालैंड आंदोलन तेज हुआ और पूरे पहाड़ में व्यापक समर्थन मिला। इसी भावना को आधार बनाकर बीजेपी ने 2009 से दार्जिलिंग क्षेत्र में लगातार चुनावी सफलता हासिल की।
हालांकि, समय-समय पर गोरखालैंड या स्थायी राजनीतिक समाधान का आश्वासन देने के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। यहां तक कि 11 जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग भी लंबित है।
हिन्दुस्थान समाचार / सचिन कुमार

