चुनाव 2026 : सादगी, संगठन और सत्ता—जंगीपाड़ा में किस पर लगेगी जनता की मुहर?
हुगली, 31 मार्च (हि.स.)। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले की जंगीपाड़ा विधानसभा सीट इस चुनाव में एक बेहद दिलचस्प और बहुकोणीय मुकाबले का केंद्र बन गई है। श्रीरामपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली यह सीट लंबे समय तक वामपंथ का गढ़ रही, लेकिन 2011 के बाद से अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस ने यहां अपनी मजबूत पकड़ बना ली। पिछले करीब 15 वर्षों से स्नेहाशीष चक्रवर्ती इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जिससे उनका संगठनात्मक और प्रशासनिक प्रभाव क्षेत्र में गहरा माना जाता है।
इस बार चुनाव का सबसे बड़ा आकर्षण भाजपा उम्मीदवार प्रसेनजीत बाग हैं, जो बेहद साधारण परिवार से आते हैं और आज भी मिट्टी के घर में रहते हैं। बारहवीं पास बाग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी के संगठन में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। वे पहले भी इस सीट से चुनाव लड़ चुके हैं, जिससे उन्हें स्थानीय राजनीति और मतदाताओं की नब्ज की अच्छी समझ है। उनकी सादगी और जमीनी जीवनशैली को भाजपा ‘आम आदमी की पहचान’ के रूप में प्रचारित कर रही है, जो ग्रामीण मतदाताओं के बीच खासा असर डाल रही है।
इसके विपरीत, तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार स्नेहाशीष चक्रवर्ती एक अनुभवी और शिक्षित नेता हैं। वे स्नातकोत्तर डिग्रीधारी हैं और राज्य के परिवहन मंत्री भी रह चुके हैं। तृणमूल उनके अनुभव, प्रशासनिक क्षमता और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को अपनी ताकत के रूप में पेश कर रही है। हालांकि, उनके खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी भी देखने को मिल रही है, खासकर कनेक्टिविटी और परिवहन सेवाओं को लेकर।
इस सीट पर कांग्रेस ने अधिवक्ता शुभाशीष दत्ता को उम्मीदवार बनाया है, जो पेशे से वकील हैं और एक शिक्षित, पेशेवर छवि के साथ चुनाव मैदान में हैं। वहीं माकपा ने सुदीप्तो सरकार को टिकट दिया है, जिन्हें इंडियन सेक्युलर फ्रंट का समर्थन प्राप्त है। इससे अल्पसंख्यक वोटों में संभावित बंटवारा और चुनावी समीकरण दोनों ही जटिल हो गए हैं।
जंगीपाड़ा का सामाजिक ताना-बाना भी इस चुनाव को खास बनाता है। यहां मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी खासी संख्या है, साथ ही ओबीसी और अनुसूचित जाति समुदाय भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों के मिश्रण वाले इस क्षेत्र में कृषि, छोटे व्यापार और दिहाड़ी मजदूरी मुख्य आजीविका हैं।
इस विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाला फुरफुरा शरीफ चुनावी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
सूफी परंपरा से जुड़ा यह धार्मिक केंद्र अल्पसंख्यक मतदाताओं पर गहरा प्रभाव रखता है। यहां के धार्मिक नेतृत्व और सामाजिक प्रभाव का असर चुनावी नतीजों पर पड़ना तय माना जाता है, खासकर तब जब इंडियन सेक्युलर फ्रंट सक्रिय भूमिका में हो।
स्थानीय मुद्दों की बात करें तो इस बार कनेक्टिविटी सबसे बड़ा चुनावी विषय बनकर उभरा है। लोगों का आरोप है कि परिवहन मंत्री रहने के बावजूद स्नेहाशीष चक्रवर्ती इलाके में बस सेवाओं और सड़क संपर्क में अपेक्षित सुधार नहीं कर पाए। कई बस रूट बंद होने की शिकायतें हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में लोगों की आवाजाही मुश्किल हो गई है और रोजगार व शिक्षा पर भी असर पड़ा है।
इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। जंगीपाड़ा अस्पताल में डॉक्टरों की कमी, उपकरणों का अभाव और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर स्थानीय लोगों में असंतोष है। कई मरीजों को बेहतर इलाज के लिए दूर के शहरों का रुख करना पड़ता है, जिससे आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
युवा मतदाताओं के लिए रोजगार एक बड़ा मुद्दा है। स्थानीय स्तर पर उद्योगों और अवसरों की कमी के कारण बड़ी संख्या में युवाओं को बाहर काम की तलाश में जाना पड़ता है। वहीं ग्रामीण मतदाता परिवहन और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार की मांग कर रहे हैं।
कुल मिलाकर, जंगीपाड़ा विधानसभा सीट का यह मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि दो अलग-अलग छवियों—अनुभव और सादगी—के बीच सीधी टक्कर बन गया है। अब यह देखना अहम होगा कि मतदाता लंबे समय से स्थापित नेतृत्व पर भरोसा करते हैं या फिर ‘मिट्टी के घर’ से जुड़े जमीनी उम्मीदवार को मौका देते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय पाण्डेय

