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विस चुनाव 2026 : नोआपाड़ा सीट पर बदलते शहरी समीकरण तय करेंगे उम्मीदवारों का सियासी भविष्य

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विस चुनाव 2026 : नोआपाड़ा सीट पर बदलते शहरी समीकरण तय करेंगे उम्मीदवारों का सियासी भविष्य


विस चुनाव 2026 : नोआपाड़ा सीट पर बदलते शहरी समीकरण तय करेंगे उम्मीदवारों का सियासी भविष्य


कोलकाता, 21 मार्च (हि.स.)। उत्तर 24 परगना जिले का नोआपाड़ा विधानसभा क्षेत्र 2026 के चुनाव में एक बार फिर राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण सीट बन गया है। तेजी से शहरीकरण, मेट्रो कनेक्टिविटी और बदलती जनसांख्यिकी के कारण यह सीट अब सिर्फ एक सामान्य विधानसभा क्षेत्र नहीं बल्कि कोलकाता महानगर के राजनीतिक मूड का संकेतक भी मानी जा रही है। इस बार यहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और वाम दलों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला जरूर है, लेकिन असली लड़ाई तृणमूल और भाजपा के बीच ही मानी जा रही है।

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उम्मीदवारों ने मुकाबले को बनाया हाई प्रोफाइल

इस बार तृणमूल कांग्रेस ने अपनी छात्र इकाई के प्रदेश अध्यक्ष तृणांकुर भट्टाचार्य को मैदान में उतारकर युवा चेहरे पर दांव लगाया है। दूसरी तरफ भाजपा ने बैरकपुर क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाले पूर्व सांसद अर्जुन सिंह को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। वाम मोर्चा ने गार्गी चटर्जी को उतारकर अपने पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत रखने की कोशिश की है।

अर्जुन सिंह ने कहा है कि वह हर हाल में इस सीट से जीत दर्ज करेंगे। इस बार भ्रष्टाचार और चोरी की वजह से तृणमूल को लोग हराएंगे।

वहीं तृणांकुर ने कहा कि भाजपा की नफरत की राजनीति बंगाल में नहीं चलेगी और नोआपाड़ा में अर्जुन सिंह को हार का सामना करना पड़ेगा। वहीं वाम उम्मीदवार गार्गी चटर्जी ने कहा है कि भाजपा और तृणमूल दोनों ने जनता को बेवकूफ बनाने का काम किया है और लोग विकल्प चाहते हैं।

------लंबे समय तक रहा वाम दलों का दबदबा, विगत दो दशकों से तृणमूल हावी

1957 में अस्तित्व में आई इस सीट पर लंबे समय तक वाम दलों खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का दबदबा रहा और पार्टी ने यहां आठ बार जीत दर्ज की। तृणमूल कांग्रेस ने 2001 में पहली बार इस सीट पर जीत हासिल कर वाम दलों की लगातार जीत का सिलसिला तोड़ा था। 2006 में वाम दलों ने आखिरी बार यह सीट जीती थी। इसके बाद से यहां राजनीतिक समीकरण लगातार बदलते रहे हैं और तृणमूल तथा कांग्रेस को भी जीत मिली है।

2011 में तृणमूल की मंजू बसु ने बड़ी जीत दर्ज की थी, लेकिन 2016 में उन्हें कांग्रेस के मधुसूदन घोष से मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा। 2018 के उपचुनाव में तृणमूल ने सुनील सिंह को उतारा जिन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की। 2021 में फिर मंजू बसु को मैदान में उतारा गया और उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे सुनील सिंह को हराकर सीट वापस हासिल कर ली।

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लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग रुझान

नोआपाड़ा सीट की खास बात यह रही है कि विधानसभा चुनावों में जहां तृणमूल का प्रदर्शन उतार-चढ़ाव वाला रहा है, वहीं लोकसभा चुनावों में पार्टी को लगातार बढ़त मिलती रही है। 2009 से 2024 तक हुए लोकसभा चुनावों में तृणमूल ने यहां बढ़त बनाए रखी है, हालांकि 2019 में भाजपा ने कड़ी टक्कर दी थी और अंतर बेहद कम रह गया था। 2024 में तृणमूल ने फिर अपनी बढ़त बढ़ाई।

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मतदाताओं के रुख में होता रहा बदलाव

नोआपाड़ा मुख्य रूप से शहरी विधानसभा क्षेत्र है जहां लगभग 95 प्रतिशत मतदाता शहरी हैं। अनुसूचित जाति के मतदाता लगभग 18 प्रतिशत, मुस्लिम मतदाता करीब 11 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति लगभग डेढ़ प्रतिशत हैं।

यहां मतदान प्रतिशत में गिरावट का ट्रेंड भी साफ दिखता है। 2011 में जहां लगभग 83 प्रतिशत मतदान हुआ था, वहीं 2021 में यह घटकर करीब 73 प्रतिशत रह गया। विशेषज्ञ मानते हैं कि शहरी क्षेत्रों में मतदान के प्रति उदासीनता का असर यहां भी दिख रहा है।

2026 में क्या होंगे निर्णायक मुद्दे?

इस चुनाव में शहरी सुविधाएं, ट्रैफिक, ड्रेनेज, रोजगार, स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। भाजपा एंटी इनकंबेंसी और लंबे समय से सत्ता में रही तृणमूल के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि तृणमूल अपने संगठन और सरकारी योजनाओं के आधार पर बढ़त बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है।

राजनीतिक विश्लेषण बताते हैं कि संगठनात्मक ताकत और पिछले चुनावों के ट्रेंड को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस को शुरुआती बढ़त मिलती दिख रही है, लेकिन भाजपा ने जिस तरह बैरकपुर औद्योगिक बेल्ट में अपनी पकड़ मजबूत की है उससे मुकाबला कड़ा होने की संभावना है। वाम दलों का स्थिर वोट प्रतिशत भी परिणाम को प्रभावित कर सकता है।

कुल मिलाकर नोआपाड़ा 2026 में उन सीटों में शामिल है जहां शहरी वोटर का मूड, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि और बूथ स्तर की रणनीति जीत-हार का फैसला करेगी। अगर भाजपा अपने वोट आधार को पूरी तरह एकजुट करने में सफल होती है तो मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर