बांकुड़ा के गांव में पंचमुखी दशभुज विश्वकर्मा की अनोखी पूजा, हंस है देवशिल्पी का वाहन
बांकुड़ा, 18 सितंबर (हि. स.)। भगवान विश्वकर्मा की आमतौर पर चतुर्भुज प्रतिमा और उनका वाहन हाथी देखा जाता है। उनके हाथों में विभिन्न प्रकार के औजार रहते हैं। लेकिन बांकुड़ा के एक गांव में भगवान विश्वकर्मा की अनोखी प्रतिमा की पूजा की जाती है। यहां देवशिल्पी विश्वकर्मा पंचमुखी और दशभुज हैं तथा उनका वाहन हाथी नहीं, बल्कि हंस है। बांकुड़ा जिले के गंगाजलघाटी प्रखंड की कपिष्ठा ग्राम पंचायत के शालबेड़िया गांव में इस विशेष रूप के विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।
यह किसी विशेष थीम पर आधारित पूजा नहीं है। इसी स्वरूप में गांव में लंबे समय से भगवान विश्वकर्मा की पूजा होती आ रही है। कई पीढ़ियों से इस पूजा का आयोजन किया जा रहा है।
स्थानीय बुजुर्गों ने बताया, स्वतंत्रता से पहले से ही यहां यह पूजा होती आ रही है। गांव के कर्मकार समुदाय के लोगों ने इस पूजा की शुरुआत की थी। कांसा के बर्तन बनाने के काम से जुड़े कर्मकार समुदाय के लिए सृष्टि और शिल्प के देवता भगवान विश्वकर्मा आराध्य हैं। आज भी कर्मकार समुदाय के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस पूजा को करते आ रहे हैं।
शालबेड़िया गांव का कर्मकार समाज भगवान विश्वकर्मा के पंचमुखी और दशभुज स्वरूप की पूजा करता है। उनके दस हाथों में वेद, सुदर्शन चक्र, त्रिशूल, गदा, शंख, हथौड़ा, तुलादंड और कमंडलु सहित विभिन्न वस्तुएं रहती हैं। उनका वाहन हंसराज है। भगवान विश्वकर्मा के दोनों ओर देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती विराजमान रहती हैं।
गांव के लोगों का विश्वास है कि भगवान विश्वकर्मा के पांच मुख पांच प्रकार के शिल्प और शिल्पकारों के प्रतीक हैं। इनमें लोहा, लकड़ी, सोना, पत्थर आदि विभिन्न शिल्प शामिल हैं। उनका मानना है कि देवशिल्पी एक साथ अनेक प्रकार के कार्य कर सकते हैं। इसी कारण उनके दस हाथों के माध्यम से विभिन्न कार्यों का प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शन किया गया है।
इस पूजा की एक और विशेषता है। यहां भगवान विश्वकर्मा की पूजा का पौरोहित्य कोई ब्राह्मण नहीं करता। कर्मकार समुदाय के लोग उपवीत धारण कर स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा की पूजा कराते हैं।
कर्मकार समुदाय के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा के पांच मानस पुत्र माने जाते हैं, जिनमें कर्मकार भी एक हैं। इनके अनुसार, सभी विश्वकर्मावंशी ब्राह्मण के रूप में परिचित हैं और उन्हें पूजा करने का अधिकार प्राप्त है। उनके उपवीत धारण करने की परंपरा भी है।
शालबेड़िया गांव में माधव कर्मकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा कराते हैं। वह पिछले 40 वर्षों से पूजा का पौरोहित्य कर रहे हैं। माधव के अनुसार, उनके पिता और दादा भी इसी पूजा का पौरोहित्य करते थे।
हालांकि पंचमुखी विश्वकर्मा की पूजा केवल शालबेड़िया गांव तक सीमित नहीं है। कर्नाटक, तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कुछ अन्य क्षेत्रों में भी पांच मुख और दस हाथ वाले भगवान विश्वकर्मा की पूजा की परंपरा है।
शालबेड़िया के अलावा बांकुड़ा जिले में भी तीन अन्य स्थानों पर पंचमुखी विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

