स्वास्थ्य साथी योजना में हजारों करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार का आरोप, जांच दूसरी एजेंसी को सौंपने की तैयारी
कोलकाता, 3 नवंबर (हि.स.)। पश्चिम बंगाल की स्वास्थ्य साथी योजना में बड़े पैमाने पर वित्तीय भ्रष्टाचार का मामला सामने आने के बाद राज्य का स्वास्थ्य विभाग अब इसकी जांच किसी दूसरी जांच एजेंसी को सौंपने की तैयारी में है। ाशराज्य के स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखोपाध्याय ने मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस संबंध में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात के लिए समय मांगा गया है। मुख्यमंत्री की अनुमति मिलने पर स्वास्थ्य साथी योजना से जुड़े दस्तावेज संबंधित जांच एजेंसी को सौंपे जाएंगे।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि इस कथित घोटाले में विभाग के निचले स्तर के कर्मचारियों से लेकर अस्पतालों, लाभार्थियों, चिकित्सकों और मरीजों के परिजनों तक की भूमिका सामने आई है। उनके अनुसार, स्वास्थ्य विभाग के लिए इस पूरे मामले के सभी पहलुओं की जांच करना कठिन है। इसलिए वित्तीय अनियमितताओं की जांच में विशेषज्ञ किसी दूसरी एजेंसी की सहायता लेने पर विचार किया जा रहा है।
गौरतलब है कि पिछले गुरुवार को स्वास्थ्य साथी योजना में फर्जी लाभार्थियों के नाम पर हजारों करोड़ रुपये के कथित घोटाले का मामला पहली बार सामने आया था। उस समय स्वास्थ्य मंत्री ने शुरुआती जांच के आधार पर 25 से 30 हजार करोड़ रुपये की अनियमितता का अनुमान जताया था। मंगलवार को उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य साथी कार्ड के माध्यम से जिस तरह से कथित भ्रष्टाचार हुआ है, उसकी व्यापक जांच के लिए अलग जांच एजेंसी की आवश्यकता है।
शारद्वत मुखोपाध्याय ने कहा कि इस तरह के वित्तीय भ्रष्टाचार की विस्तृत जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग के पास न तो पर्याप्त समय है और न ही अपेक्षित विशेषज्ञता। विभाग ने स्वास्थ्य साथी योजना से संबंधित दस्तावेज तैयार कर लिए हैं। मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद उनकी अनुमति मिलने पर पिछले दस वर्षों के दौरान हुई कथित अनियमितताओं की जांच किसी जांच एजेंसी को सौंपने पर विचार किया जाएगा।
स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार, विभागीय जांच में कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। मृत व्यक्तियों के स्वास्थ्य साथी कार्ड का इस्तेमाल कर बार-बार फर्जी चिकित्सा बिल तैयार किए गए। इन बिलों की जांच और मंजूरी की जिम्मेदारी थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर (टीपीए) संस्थाओं की थी। आरोप है कि इन संस्थाओं ने फर्जी बिलों को पकड़ने के बजाय उन्हें मंजूरी दिलाने में मदद की।
मंत्री ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि कुछ मामलों में स्वास्थ्य साथी योजना के तहत इलाज के दौरान ही लाभार्थी की मृत्यु हो गई थी, लेकिन तीन-चार साल बाद उसी मृत व्यक्ति को दोबारा अस्पताल में भर्ती दिखाया गया। यहां तक कि उसके नाम पर ऑपरेशन किए जाने का बिल भी स्वास्थ्य विभाग को मंजूरी के लिए भेजा गया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि परिवार के सदस्य इसमें शामिल नहीं थे, तो मृत व्यक्ति का स्वास्थ्य साथी कार्ड संबंधित नर्सिंग होम तक कैसे पहुंचा?
स्वास्थ्य मंत्री ने संकेत दिया कि इस घोटाले में केवल अस्पताल या नर्सिंग होम ही नहीं, बल्कि योजना से जुड़े विभिन्न स्तरों के लोगों की भूमिका की भी जांच आवश्यक है। विभाग का मानना है कि यह मामला कुछ अलग-अलग घटनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक व्यवस्थित तरीके से काम करने वाला तंत्र हो सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

