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सिलीगुड़ी का ऐतिहासिक टाउन स्टेशन लौट रहा गौरव की ओर, दशकों बाद शुरू हुआ जीर्णोद्धार

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सिलीगुड़ी का ऐतिहासिक टाउन स्टेशन लौट रहा गौरव की ओर, दशकों बाद शुरू हुआ जीर्णोद्धार


सिलीगुड़ी, 18 सितंबर (हि. स.)। जिस रेलवे स्टेशन के आसपास सिलीगुड़ी शहर के विकास की शुरुआती कहानी लिखी गई, वह ऐतिहासिक सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन अब लंबे समय की उपेक्षा के बाद फिर से अपने पुराने गौरव की ओर लौट रहा है। स्टेशन के जीर्णोद्धार का काम शुरू होने से इतिहास और रेलवे विरासत में रुचि रखने वाले लोगों में उत्साह है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में जब उत्तर बंगाल में रेल की शुरुआत हुई, तब सिलीगुड़ी का सामाजिक और आर्थिक स्वरूप तेजी से बदलने लगा। दार्जिलिंग की चाय, पहाड़ों से मैदानी इलाकों तक माल की आवाजाही और लोगों के आवागमन में रेलवे की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन के आसपास धीरे-धीरे बाजार, गोदाम और बस्तियां विकसित होने लगीं और छोटे से कस्बे का आर्थिक महत्व बढ़ता गया।

सिलीगुड़ी और कोलकाता के बीच रेल संपर्क औपचारिक रूप से 1878 में शुरू हुआ था। उस समय ट्रेन सेवा पद्मा नदी के दक्षिणी तट पर दामुकदिया घाट तक पहुंचती थी। नदी पार करने के बाद उत्तर बंगाल की ओर रेल सेवा जारी रहती थी। ईश्वरदी, सांताहर, पार्वतीपुर, हिली, नीलफामारी, हल्दीबाड़ी और जलपाईगुड़ी होते हुए रेल सिलीगुड़ी पहुंचती थी।

रेल संपर्क ने दार्जिलिंग और आसपास के चाय व्यापार को नई गति दी। इससे पहले पहाड़ों से माल लाने-ले जाने के लिए टांगा और बैलगाड़ियों पर निर्भर रहना पड़ता था, जो धीमा और कठिन था।

इसके बाद दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे का ऐतिहासिक दौर शुरू हुआ। 1879 में निर्माण कार्य शुरू हुआ और 1880 में सिलीगुड़ी से तीनधारिया तथा बाद में कर्सियांग तक रेल सेवा पहुंची। जुलाई 1881 में दार्जिलिंग तक रेल लाइन पूरी हुई। यही ऐतिहासिक रेल सेवा आगे चलकर ‘टॉय ट्रेन’ के नाम से मशहूर हुई।

पहाड़ों की खड़ी चढ़ाई पार करने के लिए रेलवे इंजीनियरों ने जिगजैग और लूप जैसी अनोखी तकनीकों का इस्तेमाल किया। दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की यह विरासत आज यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।

रेलवे के विस्तार के साथ सिलीगुड़ी का सामाजिक और प्रशासनिक महत्व भी बढ़ता गया। बाजार, सरकारी कार्यालय, अस्पताल, डाकघर, अदालत, स्कूल और कॉलेज सहित शहर के कई महत्वपूर्ण संस्थानों के विकास में रेलवे की भूमिका रही। चाय और संतरे के अलावा तिब्बत के साथ होने वाले व्यापार में भी सिलीगुड़ी महत्वपूर्ण केंद्र बना। कालिम्पोंग और पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाला सामान रेलवे के जरिए मैदानी इलाकों तक पहुंचाया जाता था। 1915 में सिलीगुड़ी से गेलेखोला तक तीस्ता वैली लाइन शुरू होने के बाद कालिम्पोंग की ओर संपर्क को भी नई गति मिली।

सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन अनेक ऐतिहासिक हस्तियों की यात्राओं से जुड़ी स्मृतियों का भी हिस्सा रहा है। स्थानीय बुजुर्गों की स्मृतियों में स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ ठाकुर, देशबंधु चित्तरंजन दास, भगिनी निवेदिता, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, बाघा जतिन, जगदीश चंद्र बोस और अवनींद्रनाथ ठाकुर जैसे नामों का उल्लेख मिलता है। हालांकि, शोधकर्ताओं के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की स्टेशन पर उपस्थिति से जुड़े दस्तावेजी प्रमाणों का अलग-अलग सत्यापन आवश्यक है।

1912 में पद्मा नदी पर हार्डिंग ब्रिज बनने के बाद रेल संपर्क में बदलाव आया, लेकिन 1947 के देश विभाजन ने कोलकाता और सिलीगुड़ी के बीच पुराने सीधे रेल संपर्क को प्रभावित किया। इसके बाद उत्तर बंगाल के लिए नए रेल बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी हुआ।धीरे-धीरे सिलीगुड़ी जंक्शन का महत्व बढ़ा और 1960 के दशक में न्यू जलपाईगुड़ी (एनजेपी) जंक्शन के विकसित होने के बाद लंबी दूरी की ट्रेनों का प्रमुख केंद्र भी बदल गया। इसका असर सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन पर पड़ा और उसकी पुरानी व्यस्तता कम होती चली गई।

1950 की भीषण बाढ़ और भूस्खलन में तीस्ता वैली लाइन का बुरी तरह प्रभावित हुआ और बाद में यह मार्ग दोबारा पूरी तरह बहाल नहीं हो सका। इसके बाद टाउन स्टेशन शहर के बदलते दौर का एक शांत गवाह बनकर रह गया।

लंबे इंतजार के बाद अब सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन के संरक्षण और जीर्णोद्धार की दिशा में काम शुरू हुआ है। 2025 में पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे की ओर से स्टेशन के पुनर्विकास के लिए विशेष राशि आवंटित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। क्रमशः जून 2026 में जीर्णोद्धार कार्य शुरू होने की खबर सामने आई थी।

योजना के तहत पुराने स्टेशन भवन, पारंपरिक टिन की छत और आसपास के बुनियादी ढांचे को संरक्षित और विकसित किया जाएगा। भविष्य में यहां संग्रहालय बनाने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। इस दौरान स्टेशन की मूल ऐतिहासिक वास्तुकला और पुराने स्वरूप को बनाए रखने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन का यह पुनरुद्धार सिर्फ एक पुराने रेलवे भवन की मरम्मत नहीं, बल्कि शहर के रेलवे इतिहास और उसकी जड़ों को संरक्षित करने की कोशिश है। टॉय ट्रेन, दार्जिलिंग की चाय, कालिम्पोंग के संतरे, पुराने व्यापारिक मार्ग, देश विभाजन और बाद में सिलीगुड़ी जंक्शन व एनजेपी के विकास—इन सभी बदलावों का यह स्टेशन लंबे समय से मौन साक्षी रहा है।

आज के आधुनिक और व्यस्त सिलीगुड़ी के बीच यह स्टेशन शहर के पुराने दौर की याद दिलाता है। यदि प्रस्तावित संरक्षण और संग्रहालय की योजना पूरी होती है, तो यह आने वाली पीढ़ियों को सिलीगुड़ी के रेलवे इतिहास और शहर के विकास की कहानी से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार / सचिन कुमार