सालानपुर में प्राकृतिक खेती को लेकर किसानों को किया गया जागरूक
पश्चिम बर्दवान, 13 जून (हि.स.)।
पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा पूरे राज्य में प्राकृतिक खेती और जैविक खाद के उपयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लगातार जागरूकता कार्यक्रम और कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। इसी क्रम में बाराबनी विधानसभा क्षेत्र के सालानपुर स्थित नंदनिक हॉल में कृषि विभाग की ओर से एक विशेष कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें किसानों को प्राकृतिक खेती के फायदे और जैविक खाद के उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में बाराबनी के विधायक अरिजीत रॉय, कृषि विभाग के अधिकारी तथा बड़ी संख्या में स्थानीय किसान उपस्थित रहे। कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने किसानों को खेती की पारंपरिक और प्राकृतिक पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया।
इस अवसर पर विधायक अरिजीत रॉय ने कहा कि राज्य सरकार चाहती है कि अधिक से अधिक किसान प्राकृतिक और पर्यावरण अनुकूल खेती को अपनाएं। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की उर्वरता कम होती है, भूजल प्रभावित होता है और इसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। कई मामलों में रासायनिक अवशेष भोजन के माध्यम से शरीर तक पहुंचकर गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि जैविक और प्राकृतिक खेती केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह किसानों के लिए लागत कम करने और टिकाऊ कृषि व्यवस्था विकसित करने का भी एक प्रभावी विकल्प है।
कार्यशाला में किसानों को बताया गया कि प्राकृतिक खेती में गोबर, गोमूत्र, वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत, घनजीवामृत, हरी खाद और खेतों के जैविक अवशेषों का उपयोग किया जाता है। इससे मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ते हैं और लंबे समय तक जमीन की उत्पादक क्षमता बनी रहती है।
कृषि अधिकारियों ने जानकारी दी कि जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ती है, फसलों की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है। साथ ही बाजार में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने से किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिलने की संभावना भी रहती है।
कार्यक्रम के दौरान किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीक, खाद तैयार करने की प्रक्रिया और सरकारी सहायता योजनाओं की भी जानकारी दी गई। अधिकारियों ने किसानों से अपील की कि वे धीरे-धीरे रासायनिक खेती पर निर्भरता कम कर प्राकृतिक विकल्पों को अपनाएं ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ पर्यावरण और सुरक्षित खाद्य व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके।
इस जागरूकता और प्रशिक्षण के माध्यम से अधिक से अधिक किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़कर कृषि क्षेत्र को अधिक टिकाऊ और स्वास्थ्य अनुकूल बनाया जा सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष विश्वकर्मा

