home page

पूजा 2026 : बांकुड़ा के साहारजोड़ा में अनोखी परंपरा, घट में होती है दुर्गा पूजा

 | 
पूजा 2026 : बांकुड़ा के साहारजोड़ा में अनोखी परंपरा, घट में होती है दुर्गा पूजा


बांकुड़ा, 24 सितंबर (हि. स.)। जिले के बड़जोड़ा प्रखंड के साहारजोड़ा गांव में दुर्गा पूजा की परंपरा अपने आप में अनोखी है। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती। मंदिर परिसर में रखे घट में ही देवी की पूजा की जाती है। दुर्गा पूजा के चारों दिन इसी घट को देवी का स्वरूप मानकर आराधना होती है।

स्थानीय मान्यता के अनुसार, देवी महामाया के स्वप्नादेश के कारण साहारजोड़ा में देवी की प्रतिमा स्थापित करना निषिद्ध है। गांव के इस मंदिर का इतिहास भी काफी पुराना बताया जाता है, हालांकि यह मंदिर कब स्थापित हुआ, इसकी स्पष्ट जानकारी किसी के पास नहीं है।

लोककथा के अनुसार, कई वर्ष पहले गांव के किसान सुरा बाउरी खेत में हल चला रहे थे। इसी दौरान हल की नोक एक पत्थर से टकराई। इसके बाद खेत की जमीन लाल हो गई। भयभीत होकर सुरा बाउरी घर लौट गए। उसी रात उन्हें देवी महामाया का स्वप्नादेश हुआ। इसके बाद खेत से उस पत्थर को निकालकर पूजा शुरू की गई। आज भी उसी शिलाखंड को महामाया के रूप में पूजा जाता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, एक बार गांव के कुछ युवकों ने मिट्टी की दुर्गा प्रतिमा बनाकर पूजा करने की पहल की थी। लेकिन पूजा शुरू होने से पहले ही मंदिर का दरवाजा बंद हो गया। इसके बाद पुरोहित को स्वप्नादेश मिला कि घट में ही देवी की पूजा करनी होगी। तभी से यहां देवी की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा बंद हो गई।

साहारजोड़ा में केवल दुर्गा ही नहीं, बल्कि काली, मनसा, लक्ष्मी और सरस्वती की भी प्रतिमा पूजा नहीं होती। इन देवियों की पूजा भी घट के माध्यम से की जाती है। हालांकि गणेश, कार्तिक और विश्वकर्मा की प्रतिमाओं की पूजा की जाती है।

दुर्गा पूजा के दौरान मंदिर परिसर में विशेष आयोजन होते हैं। संधि पूजा प्राचीन जलघड़ी देखकर की जाती है। यहां बलि की भी परंपरा है। गन्ने और कुम्हड़े के अलावा बकरे की बलि भी दी जाती है। दशमी की शाम पालकी में रखकर घट का विसर्जन किया जाता है। इसके बाद धुनो पोड़ानो और दंडीस सेवा सहित कई धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।

दशमी के दिन साहारजोड़ा मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, बांकुड़ा और बड़जोड़ा के अलावा रानीगंज, आसनसोल, दुर्गापुर और कोलकाता से भी लोग यहां पूजा देखने आते हैं। झारखंड और बिहार के धनबाद, रांची तथा पटना से भी श्रद्धालुओं के पहुंचने का दावा स्थानीय लोग करते हैं।

साहारजोड़ा के लोगों में मान्यता है कि मां महामाया किसी भक्त को खाली हाथ नहीं लौटातीं। यहां भले ही मां दुर्गा की दस भुजाओं वाली प्रतिमा दिखाई नहीं देती, लेकिन घट में देवी की पूजा और वर्षों पुरानी परंपरा आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता