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आसनसोल रेंज में स्थित चित्तरंजन जलाशयों का निरीक्षण

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आसनसोल रेंज में स्थित चित्तरंजन जलाशयों का निरीक्षण


आसनसोल, 21 जनवरी (हि. स.)। पश्चिम बंगाल में वार्षिक प्रवासी पक्षी गणना अभियान के तहत दुर्गापुर फॉरेस्ट डिवीजन के आसनसोल रेंज में स्थित चित्तरंजन जलाशयों का निरीक्षण किया गया। यह गणना पश्चिम बंगाल वन विभाग द्वारा 11 जनवरी से एक फरवरी 2026 तक राज्य के विभिन्न जिलों में नदियों, बांधों और जलाशयों में की जा रही है। उद्देश्य है प्रवासी पक्षियों की संख्या, प्रजातियों और पर्यावरणीय परिस्थितियों का आकलन करना।

इस अभियान में वन अधिकारी, वनकर्मी, पक्षी विशेषज्ञ (ऑर्निथोलॉजिस्ट) और पर्यावरण से जुड़ी स्वयंसेवी संस्था ‘विंग्स’ के विशेषज्ञ संयुक्त रूप से भाग ले रहे हैं। प्रारंभिक गणना के बाद तथ्य सामने आया कि चित्तरंजन जलाशयों में प्रवासी पक्षियों की संख्या जिले के अन्य वेटलैंड्स की तुलना में काफी कम दर्ज की गई है, जिसने पर्यावरणविदों और वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है।

वन अधिकारियों के अनुसार, कभी चित्तरंजन के जलाशय सर्दियों में प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद आश्रय माने जाते थे। देश-विदेश से विभिन्न प्रजातियों के पक्षी यहां बड़ी संख्या में आते थे और जलाशयों की प्राकृतिक सुंदरता को जीवंत बना देते थे। बीते कुछ वर्षों में यह दृश्य लगातार फीका पड़ता जा रहा है।

इस वर्ष की गणना में लेसर व्हिसलिंग डक, यूरेशियन विगॉन, नॉर्दर्न पिंटेल, टफ्टेड डक, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, कॉमन पोचार्ड और रूडी शेल्डक जैसी प्रजातियों की उपस्थिति तो दर्ज की गई, लेकिन इनकी संख्या सीमित पाई गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले वर्ष की तुलना में भी कई जलाशयों में पक्षियों की संख्या में गिरावट देखी गई है।

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, प्रवासी पक्षियों की संख्या घटने के पीछे मानवीय गतिविधियां सबसे बड़ा कारण बन रही हैं। जलाशयों में नावों के जरिए मछली पकड़ना, लगातार मानवीय आवाजाही, शोर-शराबा और पक्षियों को बार-बार परेशान किया जाना उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर रहा है। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रों में मछली पालन के दौरान इस्तेमाल होने वाले रसायन और जल प्रदूषण भी पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ रहे हैं।

गणना पूरी होने के बाद वन विभाग और पक्षी विशेषज्ञों ने इस स्थिति पर गंभीर चिंता जताई। उनका कहना है कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में चित्तरंजन जलाशय प्रवासी पक्षियों के नक्शे से लगभग गायब हो सकता है। यह केवल पक्षियों की घटती संख्या का सवाल नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के लिए खतरे की घंटी है।

पर्यावरणविदों का मानना है कि चित्तरंजन जलाशय कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैव विविधता के लिए जाना जाता था, अब वह पहचान धीरे-धीरे खोता जा रहा है। इस संकट से उबरने के लिए जरूरी है कि स्थानीय लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए और मानवीय गतिविधियों पर नियंत्रण किया जाए।

विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यदि समय रहते संरक्षण के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर केवल प्रवासी पक्षियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत और पर्यावरणीय संतुलन को भारी नुकसान पहुंचेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष विश्वकर्मा