दुर्गा पूजा 2026 : पांशकुड़ा के मौचाक सेवाश्रम में मिस्र की झलक, आयोजन की थीम ‘दबाव’
मेदिनीपुर, 03 अक्टूबर (हि.स.)। पूर्व मेदिनीपुर जिले के पांशकुड़ा ब्लॉक के माइशोरा पंचायत अंतर्गत मंगलई गांव में मौचाक सेवाश्रम की दुर्गापूजा इस वर्ष सामाजिक समरसता और मिस्र की प्राचीन सभ्यता के अनूठे मेल के साथ आयोजित की जा रही है। पूजा के 20वें वर्ष में ‘चाप’ यानी दबाव को विषय बनाया गया है। हिंदू, मुस्लिम और आदिवासी समुदाय के लोगों की संयुक्त भागीदारी से आयोजित इस पूजा में मंडप से लेकर दुर्गा प्रतिमा तक मिस्र की सभ्यता की झलक दिखाई देगी।
मौचाक सेवाश्रम की स्थापना वर्ष 2002 में स्थानीय श्यामसुंदरपुर पाटना उच्च विद्यालय के शिक्षक मृणालसुंदर पात्र ने अपनी पैतृक जमीन पर जरूरतमंद विद्यार्थियों के लिए की थी। यहां विद्यार्थियों को सप्ताह में एक दिन हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिया जाता था। बच्चे मिट्टी से गुड़िया और प्रतिमाएं बनाते थे। वर्ष 2006 में सेवाश्रम के तीन विद्यार्थियों बिंदु सिंह, करीम अली और यादव जाना ने मिलकर अपने हाथों से पहली दुर्गा प्रतिमा बनाई। इसी के साथ मौचाक सेवाश्रम में दुर्गापूजा की शुरुआत हुई। वर्ष 2007 से यहां बड़े स्तर पर दुर्गापूजा का आयोजन होने लगा।
इस वर्ष ‘चाप’ (दबाव) विषय के माध्यम से प्रकृति और बच्चों पर बढ़ते विभिन्न दबाव को दर्शाया गया है। मंडप के प्रवेश द्वार पर एक काल्पनिक प्रतिमा बनाई गई है, जिसके माध्यम से प्रकृति पर मनुष्य के बढ़ते दबाव और उसके कारण पृथ्वी के थकने का संदेश दिया जा रहा है। वहीं, पारिवारिक और सामाजिक दबाव के कारण बच्चों का बचपन किस तरह प्रभावित हो रहा है, इसे भी मंडप के अंदर प्रदर्शित किया गया है।
मंडप की आंतरिक सज्जा में मिस्र की प्राचीन सभ्यता को प्रमुखता दी गई है। यहां पिरामिड, मिस्र की कलाकृतियां, विभिन्न मूर्तियां और ममी के प्रतिरूप आकर्षण का केंद्र होंगे। दुर्गा प्रतिमा में भी मिस्र की कला और देवी-देवताओं की शैली की छाप देखने को मिलेगी।
कम बजट में आयोजित होने वाली मौचाक सेवाश्रम की यह पूजा अब क्षेत्र में सामाजिक समरसता का प्रमुख उदाहरण बन गई है। पूजा समिति के सदस्य करीम अली और बिंदु सिंह तथा सचिव देबव्रत कवि के अनुसार पूजा के दौरान विभिन्न समुदायों के लोग जात-पात और भेदभाव से ऊपर उठकर एक साथ कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, भोजन करते हैं और उत्सव मनाते हैं।
करीम अली ने बताया कि करीब दो दशक पहले कुछ लोगों ने मिलकर दुर्गा प्रतिमा बनाने की शुरुआत की थी। उस समय यह कल्पना नहीं थी कि पूजा आगे चलकर इतने बड़े आयोजन का रूप लेगी। बिंदु सिंह ने कहा कि मौचाक सेवाश्रम की पूजा सामाजिक समरसता का उदाहरण है और पूजा के दिनों में यह सभी धर्मों के लोगों के मिलन स्थल में बदल जाता है।
सेवाश्रम के संस्थापक मृणालसुंदर पात्र ने कहा कि कम बजट में हर वर्ष नई सोच के साथ पूजा का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष सामाजिक संदेश और मिस्र की सभ्यता के मेल को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

