home page

रविंद्र और सुभाष सरोवर में फिर होगी छठ पूजा, अग्निमित्रा पाल ने कहा -हिंदुओं के त्योहारों का राजनीतिकरण बर्दाश्त नहीं

 | 
रविंद्र और सुभाष सरोवर में फिर होगी छठ पूजा, अग्निमित्रा पाल ने कहा -हिंदुओं के त्योहारों का राजनीतिकरण बर्दाश्त नहीं


कोलकाता, 04 नवंबर (हि.स.)। पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली बार छठ पूजा को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। राज्य सरकार इस बार कोलकाता के रविंद्र सरोवर और सुभाष सरोवर में भी छठ पूजा की अनुमति देने की तैयारी कर रही है। बुधवार को शहरी विकास एवं नगरपालिका मंत्री अग्निमित्रा पाल ने नगर निगम के अधिकारियों के साथ गंगा घाटों और हावड़ा तथा कोलकाता के विभिन्न छठ घाटों का निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि पिछली सरकार के कार्यकाल में राजनीति के कारण हिंदुओं के त्योहारों पर रोक लगाई गई थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होने दिया जाएगा।

अग्निमित्रा पाल ने शहरी विकास विभाग के राज्य मंत्री उमेश राय और नगर आयुक्त स्मिता पांडेय के साथ घाटों का निरीक्षण किया। उन्होंने कहा कि इस वर्ष 13 से 16 नवंबर तक छठ पूजा मनाई जाएगी। त्योहार में अब बहुत कम समय बचा है, इसलिए सभी घाटों की व्यवस्था समय पर पूरी करने के लिए नगर निगम को निर्देश दिए गए हैं। मुख्यमंत्री के निर्देश पर शहर से लेकर जिलों तक तालाबों, नदियों और घाटों की स्थिति पर विशेष निगरानी रखी जा रही है।

मंत्री ने बताया कि इस बार कोलकाता के सभी तालाबों, झीलों और गंगा घाटों पर छठ पूजा की व्यवस्था की जाएगी। छठ व्रतियों की सुविधा के लिए तालाबों और घाटों पर पेवर ब्लॉक लगाकर अस्थायी रास्ते बनाए जाएंगे। प्रत्येक घाट पर चेंजिंग रूम और बायो टॉयलेट की व्यवस्था होगी। सूर्योदय से पहले पूजा की परंपरा को ध्यान में रखते हुए पर्याप्त रोशनी का इंतजाम किया जाएगा। श्रद्धालुओं को रास्ता बताने के लिए विभिन्न स्थानों पर दिशा-सूचक बोर्ड लगाए जाएंगे।

आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए प्रत्येक घाट पर आपातकालीन संपर्क नंबर उपलब्ध रहेगा। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए स्वयंसेवकों की तैनाती की जाएगी। एक साथ अधिक लोगों को पानी में उतरने की अनुमति नहीं होगी। एक समूह के पूजा करके बाहर निकलने के बाद ही दूसरे समूह को पानी में उतरने दिया जाएगा।

रविंद्र और सुभाष सरोवर में पूजा को लेकर बड़ा फैसला

घाट निरीक्षण के बाद पत्रकारों से बातचीत करते हुए अग्निमित्रा पाल ने स्पष्ट कहा कि इस बार रविंद्र सरोवर में छठ पूजा होगी। उन्होंने कहा कि वहां रहने वाले श्रद्धालु आखिर पूजा करने कहां जाएंगे। पिछली सरकार के कार्यकाल में यहां छठ पूजा बंद कर दी गई थी, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। हालांकि पूजा के दौरान श्रद्धालुओं को पानी में उतरकर पूजा करने के बाद सभी पूजा सामग्री तत्काल बाहर निकालनी होगी।

सूत्रों के अनुसार, रविंद्र सरोवर में छठ पूजा के लिए चार से पांच अस्थायी घाट बनाने का मौखिक निर्देश दिया गया है। हालांकि इतने कम समय में वहां किस तरह अस्थायी घाट तैयार किए जाएंगे, इसको लेकर नगर निगम के इंजीनियरों के बीच भी असमंजस की स्थिति बनी हुई है।

गौरतलब है कि वर्ष 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देश के बाद रविंद्र सरोवर और सुभाष सरोवर में छठ पूजा पर रोक लगा दी गई थी। इसके बाद पिछली तृणमूल सरकार के कार्यकाल में श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग इलाकों में वैकल्पिक घाट तैयार किए जाते थे। अब नई सरकार दोनों सरोवरों में छठ पूजा की अनुमति देने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

हालांकि सरकार के इस फैसले पर पर्यावरणविदों ने चिंता जतानी शुरू कर दी है। 'रविंद्र सरोवर बचाओ' आंदोलन से जुड़े प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता सौमित्र मोहन घोष ने कहा कि इस मामले पर सरकार के पर्यावरण विभाग को गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इको-सेंसिटिव जोन को प्रदूषण से बचाने की बात कही थी। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का भी इस संबंध में आदेश है। रविंद्र सरोवर एक राष्ट्रीय महत्व का सरोवर है और वहां का पानी पहले से ही प्रदूषित है। हाल के दिनों में वहां मछलियों की मौत की घटनाएं भी हुई हैं।

अग्निमित्रा पाल ने स्पष्ट किया कि छठ पूजा के दौरान किसी भी कीमत पर जल प्रदूषण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके लिए पूजा से पहले ही जरूरी व्यवस्थाएं की जाएंगी। प्रत्येक घाट पर स्वयंसेवकों की तैनाती होगी और पूजा के दौरान तथा उसके बाद लगातार सफाई अभियान चलाया जाएगा। पूजा सामग्री को पानी में छोड़ने से रोकने के लिए भी विशेष निगरानी रखी जाएगी।

मंत्री ने यह भी कहा कि रविंद्र सरोवर में छठ पूजा आयोजित करने के मुद्दे पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के साथ चर्चा की जाएगी। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर है कि पर्यावरण संरक्षण और श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था के बीच संतुलन बनाते हुए सरकार किस तरह इस व्यवस्था को लागू करती है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संतोष विश्वकर्मा