प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल और खेती की बढ़ती लागत ने बढ़ाई बलागढ़ के जूट किसानों की परेशानी
हुगली, 01 सितंबर (हि. स.)। प्लास्टिक के बढ़ते इस्तेमाल और जूट की खेती की लगातार बढ़ती लागत ने हुगली के बलागढ़ ब्लॉक के जूट किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। खेतों में बड़ी मात्रा में जूट की खेती करने के बावजूद किसानों को मुनाफा तो दूर, उत्पादन लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है। स्थिति यह है कि पिछले एक दशक में बलागढ़ में जूट की खेती का क्षेत्रफल काफी घट गया है। कर्ज के बोझ से परेशान किसानों की मांग है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाई जाए और लंबे समय से बंद पड़े जूट मिलों को तत्काल खोला जाए। किसानों का मानना है कि इससे जूट की मांग बढ़ेगी और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सकेगा।
इस संकट के बीच स्थानीय विधायक एवं मंत्री सुमना सरकार ने मंगलवार को किसानों को राहत का भरोसा दिया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जूट किसानों की समस्याओं को लेकर गंभीर और संवेदनशील हैं। उनके अनुसार, पिछली सरकार की तुलना में वर्तमान सरकार ने किसानों को मिलने वाले भत्ते में भी वृद्धि की है।
मंत्री ने बताया कि बंद पड़े जूट मिलों को दोबारा खोलने के लिए सकारात्मक पहल की जा रही है। उन्होंने कहा कि नई सरकार को सत्ता में आए अभी 100 दिन ही पूरे हुए हैं, इसलिए आने वाले समय में किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए और कदम उठाए जाएंगे।
किसानों के अनुसार, वर्तमान में एक बीघा जमीन पर जूट की खेती करने में करीब 20 से 22 हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। इतनी अधिक लागत के बाद नुकसान से बचने के लिए खुले बाजार में जूट की कीमत कम से कम 15 से 16 हजार रुपये प्रति क्विंटल होनी चाहिए। लेकिन बाजार की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।
वर्तमान में जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (जेसीआई) का निर्धारित सरकारी मूल्य पांच हजार 925 रुपये प्रति क्विंटल है। वहीं, खुले बाजार में किसानों को अधिकतम करीब 10 से 12 हजार रुपये प्रति क्विंटल ही मिल रहे हैं। ऐसे में किसानों को प्रति क्विंटल जूट पर हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
बलागढ़ ब्लॉक के आंकड़ों के अनुसार, करीब 10 वर्ष पहले यहां लगभग छह हजार हेक्टेयर जमीन पर जूट की खेती होती थी। उत्पादन लागत बढ़ने और उचित कीमत नहीं मिलने के कारण अब यह क्षेत्र घटकर करीब चार हजार 250 हेक्टेयर रह गया है।
किसानों की परेशानी केवल कीमत तक सीमित नहीं है। इलाके में पानी की समस्या, रासायनिक खाद की बढ़ती कीमत और मजदूरों की बढ़ी हुई मजदूरी ने खेती की लागत और बढ़ा दी है।
किसानों का कहना है कि पर्याप्त सरकारी भंडारण केंद्र या शीतगृह की व्यवस्था नहीं होने के कारण छोटे और सीमांत किसान अपनी उपज को लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रख पाते। मजबूरी में उन्हें कम कीमत पर ही जूट महाजनों को बेच देना पड़ता है।
सुमना सरकार ने किसानों को आश्वस्त करते हुए कहा कि जूट की उचित कीमत सुनिश्चित करने और उसके भंडारण की बेहतर व्यवस्था तैयार करने के लिए जल्द आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय पाण्डेय

