आईआईटी खड़गपुर के प्लेटिनम जुबिली संवाद में भविष्य के आईआईटी की परिकल्पना
कोलकाता, 17 अगस्त (हि. स.)। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर के प्लेटिनम जुबिली समारोह सप्ताह के तहत सोमवार को आईआईटी खड़गपुर अनुसंधान पार्क, कोलकाता में ‘बियॉन्ड द आईआईटीज वी नो : बिल्डिंग द आईआईटीज दैट द नेशन एंड द वर्ल्ड विल नीड’ विषय पर उच्चस्तरीय नेतृत्व संवाद आयोजित किया गया। इसमें देश के प्रमुख शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, चिकित्सा विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं, नवप्रवर्तकों और आईआईटी के पूर्व छात्रों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम में बदलती राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप आईआईटी व्यवस्था के भविष्य पर विचार-विमर्श किया गया। आईआईटी खड़गपुर के निदेशक प्रो. सुमन चक्रवर्ती ने स्वागत संबोधन में कहा कि आईआईटी को प्रतिभा निर्माण की पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर परिवर्तन का सृजक बनना होगा।
उन्होंने आईआईटी खड़गपुर की 75 वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्थान की स्थापना एक राष्ट्रीय आवश्यकता के तहत हुई थी। अब तेजी से बदलते भारत की जरूरतों के अनुरूप संस्थान को स्वयं को नए सिरे से तैयार करने की आवश्यकता है।
प्रो. चक्रवर्ती ने भविष्य के आईआईटी के लिए पांच प्रमुख बदलावों पर जोर दिया। इनमें अलग-अलग उत्कृष्टता केंद्रों से उत्कृष्टता के नेटवर्क की ओर बढ़ना, अनुसंधान उत्कृष्टता से उसके वास्तविक प्रभाव की ओर जाना, विभाग आधारित व्यवस्था के स्थान पर समन्वित और अभिसरण मंच विकसित करना, रोजगार चाहने वालों के बजाय अवसर पैदा करने वालों का निर्माण करना तथा वैश्विक पहचान वाले राष्ट्रीय संस्थानों से राष्ट्रीय उद्देश्य वाले वैश्विक संस्थानों की ओर बढ़ना शामिल है।
उन्होंने कहा कि ज्ञान और अनुसंधान को वास्तविक सामाजिक प्रभाव में बदलना जरूरी है। इसके लिए आईआईटी को विश्वविद्यालयों, अस्पतालों, उद्योगों, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों, सरकार और उद्यमिता तंत्र के साथ अपने संबंध और मजबूत करने होंगे। अनुसंधान को खोज से आगे ले जाकर उसके व्यावहारिक उपयोग, क्रियान्वयन, उद्यम और सामाजिक प्रभाव तक पहुंचाना होगा।
कार्यक्रम में ‘रिइमैजिनिंग द आईआईटी सिस्टम : फ्रॉम नेशनल इंस्टीट्यूशंस टू ग्लोबल इनोवेशन इंजन्स’ विषय पर मुख्य वक्तव्य दिया गया। इसके अलावा आईआईटी पारिस्थितिकी तंत्र में मार्गदर्शक की भूमिका, प्रभावोन्मुख अनुसंधान, भविष्य की शिक्षा, अनुसंधान एवं नवाचार में अभिसरण, स्वास्थ्य सेवा में नवाचार, भविष्य के भारत के लिए आईआईटी तथा परिवर्तनकारी भूमिका में पूर्व छात्रों के योगदान जैसे विषयों पर विभिन्न सत्रों में चर्चा हुई।
वक्ताओं ने साझा राष्ट्रीय अनुसंधान अवसंरचना, शिक्षा-उद्योग-सरकार के बीच मजबूत सहभागिता, अंतःविषय नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा देने पर जोर दिया। अनुसंधान पार्कों को शिक्षा जगत, उद्योग, नवउद्यम, चिकित्सा विशेषज्ञों, निवेशकों और नीति-निर्माताओं को जोड़ने वाले प्रभावी तंत्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता भी बताई गई।
आईआईटी व्यवस्था के अगले चरण की परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए प्रो. चक्रवर्ती ने कहा कि पहले 75 वर्षों में भारत ने यह सिद्ध किया है कि वह विश्व के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों के समकक्ष संस्थान बना सकता है। अब अगले 25 वर्षों में यह सिद्ध करना होगा कि भारत में निर्मित संस्थान बेहतर विश्व के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

