आसनसोल के हाजरा बाड़ी में जीवित दीमक की बांबी में विराजती हैं मां दुर्गा
आसनसोल, 11 अक्टूबर (हि. स.)। पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा को लेकर अनेक लोकविश्वास और पौराणिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक अनोखी परंपरा आसनसोल के ऊषा ग्राम के न्यू घुसिक गांव स्थित हाजरा बाड़ी में देखने को मिलती है। यहां मां दुर्गा की पूजा मिट्टी की प्रतिमा बनाकर नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से बनी दीमक की बांबी को देवी का स्वरूप मानकर की जाती है। लगभग दो सौ वर्षों से चली आ रही इस पूजा की परंपरा अपनी अनूठी मान्यता के कारण लोगों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है।
हाजरा परिवार में दुर्गापूजा की शुरुआत पारंपरिक तरीके से मिट्टी की प्रतिमा बनाकर की जाती थी। लोककथा के अनुसार, लगभग दो शताब्दी पहले पूजा के दौरान एक अप्रत्याशित घटना घटी। भोग सजाने के समय दीपक की लौ से प्रतिमा के बालों में आग लग गई। इसके बाद परिवार ने उस वर्ष प्रतिमा की पूजा बंद कर घट पूजा की। मान्यता थी कि खंडित अथवा जली हुई प्रतिमा की पूजा करना उचित नहीं है। इसके बाद पूजा की जिम्मेदारी हरिपद हाजरा से दिवाकर हाजरा के हाथों में आई। इसी दौरान मंदिर के चबूतरे पर अचानक दीमक की बांबी दिखाई देने लगी। धीरे-धीरे उसका आकार बढ़ने लगा। दिवाकर हाजरा ने जब उसे हटाने का विचार किया, तो लोककथा के अनुसार उन्हें स्वप्न में देवी का आदेश मिला कि उसी प्राकृतिक स्वरूप में उनकी उपस्थिति है।
परिवार की मान्यता के अनुसार, मुख्य बांबी के आसपास छोटी-छोटी बांबियां भी दिखाई देने लगीं, जिन्हें गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती और कार्तिकेय के स्वरूप से जोड़कर देखा गया। इसके बाद परिवार ने बांबी को वस्त्रों और आभूषणों से सजाकर मां दुर्गा के रूप में उसकी पूजा शुरू कर दी।
आज भी हाजरा बाड़ी में इसी परंपरा के अनुसार मां दुर्गा की आराधना की जाती है। पूजा के दौरान ढाक की आवाज, धूप-धूने की सुगंध और धार्मिक अनुष्ठानों से पूरा परिसर भक्तिमय हो उठता है। यहां देवी की पूजा के लिए मिट्टी की प्रतिमा बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि परिवार की आस्था में प्रकृति की गोद में बनी दीमक की बांबी ही मां दुर्गा का स्वरूप है।
आसनसोल की यह अनूठी पूजा परंपरा लोकआस्था, प्रकृति और पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं का एक विशिष्ट उदाहरण मानी जाती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष विश्वकर्मा

