पूजा परिक्रमा : 350 साल पुरानी परंपरा वाली जयपुर राजबाड़ी की सोने की दुर्गा की ऐतिहासिक पूजा
पुरुलिया, 13 अक्टूबर (हि. स.)। जिले के जयपुर राजपरिवार की सोने की दुर्गा प्रतिमा की पूजा पूरे राज्य में आकर्षण का केंद्र है। वर्ष 1865 से यहां दुर्गापूजा की परंपरा चली आ रही है। सालभर देवी की सोने की प्रतिमा बैंक के सुरक्षित लॉकर में रखी जाती है, जबकि पूजा के दिनों में उसे मंदिर में स्थापित किया जाता है। प्रतिमा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस वर्ष प्रतिमा की सुरक्षा के लिए जिला पुलिस ने विशेष व्यवस्था की है।
हाल ही में पुरुलिया के कालीक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध मौतड़ स्थित काली मंदिर में चोरी की घटना के बाद जिले में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। इसी को ध्यान में रखते हुए जयपुर राजबाड़ी में होने वाली सोने की दुर्गा की पूजा को लेकर भी पुलिस सतर्क है।
जयपुर राजपरिवार के वर्तमान सदस्य प्रशांत नारायण सिंहदेव के अनुसार, मुगल बादशाह औरंगजेब के अत्याचारों के कारण उनके पूर्वज जय सिंह 1666 में उज्जैन से पुरुलिया के जंगलमहल क्षेत्र में आए थे। उस समय यहां के भूमिज राजा खामार मुंडा के साथ उनका युद्ध हुआ, जिसमें जय सिंह की जीत हुई। इसके बाद उन्होंने खामार मुंडा की तलवार को कुलदेवी के पास रखकर पूजा शुरू की।
जय सिंह की सातवीं पीढ़ी के मदनमोहन सिंह के पुत्र काशीनाथ सिंह के समय 1864 में पूजा के दौरान मंदिर के फूस की छत में दीपक से आग लग गई। आग में पूरा ठाकुरबाड़ी परिसर जलकर राख हो गया। इस घटना से राजा काफी दुखी हुए। इसके बाद उन्हें स्वप्न में देवी ने बनारस की कनक दुर्गा के स्वरूप में प्रतिमा बनवाकर जयपुर में स्थापित करने का आदेश दिया।
इसके बाद काशीनाथ सिंह बनारस से कारीगरों को लेकर आए। उन्होंने अपने खजाने से एक सेर यानी 108 सोने की अकबरी अशर्फियां कलाकारों को दीं। प्रतिमा के पीछे का सजावटी ढांचा लगभग दो मन चांदी से तैयार किया गया। बनारस के कारीगरों ने एक वर्ष के भीतर प्रतिमा का निर्माण पूरा कर दिया। वर्ष 1865 में प्रतिमा की स्थापना के साथ पूजा शुरू हुई।
वर्ष 1970 में बीरेंद्र नारायण सिंहदेव के समय जयपुर राजबाड़ी में डकैती हुई थी। डकैत घर के आभूषण लूट ले गए, लेकिन लाल कपड़े में लिपटी सोने की दुर्गा प्रतिमा को पहचान नहीं सके। इसके बाद जिला प्रशासन की सलाह पर प्रतिमा को बैंक के सुरक्षित लॉकर में रखने की व्यवस्था की गई।
इस पूजा की कुछ खास परंपराएं भी हैं। यहां देवी दुर्गा की प्रतिमा द्विभुजा स्वरूप में है। पहले पशुबलि दी जाती थी, लेकिन बाद में इसे बंद कर दिया गया।
इस राजबाड़ी की एक अन्य विशेष परंपरा चांग मछली अर्पित करने की है। मीठे पानी में पाई जाने वाली छोटी मछली को मिट्टी की थाली पर भूनकर देवी को अर्पित किया जाता है। इसके बाद अपराजिता पूजा की जाती है, जिसका उद्देश्य नकारात्मक शक्तियों का नाश करना है।
इस वर्ष जिला पुलिस अधीक्षक कुमार सनी राज ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए हैं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी नियमित रूप से जयपुर राजबाड़ी के मंदिर का दौरा कर रहे हैं। पूरे इलाके में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। रात के समय पुलिस की विशेष गश्ती गाड़ियां तैनात रहेंगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

