मशाल और ढोल बजाकर फसल की रखवाली कर रहे किसान
झाड़ग्राम, 06 सितंबर (हि. स.)। जिले के लालगढ़ क्षेत्र में हाथियों के आतंक से परेशान किसान इन दिनों अनोखे तरीके से अपनी फसल की रक्षा कर रहे हैं। किसान रात में मशाल जलाकर और धामसा-मादल बजाकर खेतों की पहरेदारी कर रहे हैं। किसानों का दावा है कि इस तरीके से हाथियों के झुंड को खेतों में प्रवेश करने से रोकने में सफलता मिल रही है।
शनिवार रात आजनाशुली निवासी मनोज महतो ने बताया कि क्षेत्र में सौ से अधिक हाथी हैं। शाम होते ही हाथी खेतों में उतरकर फसल बर्बाद कर देते हैं। उन्होंने कहा कि वन विभाग की ओर से हाथियों को भगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा रहा है, इसलिए किसान स्वयं अपनी फसल बचाने का प्रयास कर रहे हैं।
मेदिनीपुर वन विभाग के लालगढ़ वन क्षेत्र के भाउदी बीट अंतर्गत आजनाशुली गांव में पिछले कई दिनों से शाम से सुबह तक किसान बारी-बारी से खेतों की निगरानी कर रहे हैं। क्षेत्र में करीब 125 हाथियों की मौजूदगी बताई जा रही है। हाथियों का झुंड रात होते ही भोजन की तलाश में खेतों में पहुंचकर फसल को नुकसान पहुंचा रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार, करीब छह-सात दिन पहले खड़गपुर वन विभाग के कलाईकुंडा वन क्षेत्र से लगभग 120 से 125 हाथी कंसावती नदी पार कर चांदड़ा वन क्षेत्र होते हुए लालगढ़ के आजनाशुली इलाके में पहुंचे। दिन में हाथी जंगल में रहते हैं, जबकि रात में फसलों की ओर निकल आते हैं। लक्ष्मणपुर, बनिशोल और चालपुड़ा के जंगलों में हाथियों की मौजूदगी बताई गई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि हाथियों को भगाने के लिए वन विभाग को सूचना देने के बावजूद प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। इसके बाद किसानों ने स्वयं हाथियों को रोकने का प्रयास शुरू किया। उन्होंने जले हुए मोबिल से मशाल तैयार की और घरों में रखे धामसा-मादल बजाकर हाथियों को खेतों से दूर रखने की कोशिश शुरू की।
गांव के ही एक कृषक हरिपदो घोषाल ने बताया, आजनाशुली, लक्ष्मणपुर, मध्यमकुमारी सहित आसपास के क्षेत्रों में करीब सौ किसानों की 200 से 250 बीघा फसल को हाथियों के कारण नुकसान पहुंचा है।
पूर्व वन अधिकारी एवं हाथी विशेषज्ञ समीर मजूमदार ने किसानों के इस प्रयास का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि हाथी लंबे समय से पटाखों की आवाज सुनने के कारण उसके अभ्यस्त हो चुके हैं, जबकि धामसा-मादल की आवाज उनके लिए नई है। उन्होंने कहा कि हाथी बहुत कम आवृत्ति की आवाज भी सुन सकते हैं और बड़े कानों के कारण तेज व अपरिचित वाद्य ध्वनि से परेशान होकर अपना रास्ता बदल सकते हैं। आग से भी हाथी सामान्यतः डरते हैं। उनके अनुसार, हाथियों को नुकसान पहुंचाए बिना दूसरी दिशा में भेजने का किसानों का प्रयास सराहनीय है।
वन विभाग के अनुसार, कुछ दिन पहले तक लालगढ़ वन क्षेत्र में 129 हाथी थे। शुक्रवार रात 30 हाथियों के गोआलतोड़ वन क्षेत्र की ओर चले जाने के बाद करीब 99 हाथी आजनाशुली, कामरांगी जंगल और आसपास के क्षेत्रों में फैले हुए हैं। विभाग का कहना है कि तीन-चार झुंडों के एक साथ आने के कारण हाथियों की संख्या बढ़ी है। झुंड में करीब 20 शावक हैं, जिनमें कुछ की उम्र लगभग दो महीने है।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

