चुनाव 26 : एंटाली में शहरी राजनीति का तगड़ा मुकाबला, चार मुख्य दावेदारों के बीच दिलचस्प संघर्ष
कोलकाता, 26 मार्च (हि.स.)। कोलकाता के बीचों-बीच बसा एंटाली विधानसभा क्षेत्र इस बार 2026 के विधानसभा चुनाव में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यह जनरल कैटेगरी का शहरी विधानसभा क्षेत्र, कोलकाता उत्तर लोकसभा सीट के सात हिस्सों में से एक है। मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी, एंटाली मार्केट, कॉन्वेंट पार्क और एंटाली के ऐतिहासिक इलाके इसे सिर्फ शहरी व्यापार और आवास का केंद्र ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाते हैं।
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राजनीतिक इतिहास और मतदाता संरचना
1951 में विधानसभा क्षेत्र बनने के बाद एंटाली में कुल 19 चुनाव हुए हैं, जिनमें 1974 और 2004 के उपचुनाव शामिल हैं। क्षेत्र में लंबे समय तक लेफ्ट पार्टियों का दबदबा रहा, जिसमें माकपा की छह और माकपा की सात जीतें शामिल थीं। कांग्रेस ने तीन बार जीत दर्ज कर लेफ्ट का दबदबा तोड़ा, लेकिन 2011 से तृणमूल कांग्रेस ने साफ तौर पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। वर्तमान विधायक स्वर्ण कमल साहा ने लगातार तीन बार सीट जीती है। 2011 में उन्होंने माकपा के देबेश दास को 24 हजार 996 वोटों से हराया, 2016 में अंतर बढ़कर 27 हजार 988 और 2021 में बढ़कर 58 हजार 257 वोटों तक पहुंच गया।
एंटाली की आबादी में मुस्लिम मतदाता सबसे बड़ा समूह हैं, जिनकी हिस्सेदारी 36.70 प्रतिशत है। अनुसूचित जातियों का वोटर आधार 8.77 प्रतिशत है। कुल रजिस्टर्ड मतदाता 2024 में दो लाख 36 हजार 126 थे। शहरी इलाके होने के कारण वोटिंग उत्साह अपेक्षाकृत कम रहा, लेकिन पिछले चुनावों में यह 67.98 प्रतिशत से लेकर 72.49 प्रतिशत तक दर्ज की गई। कुल मिलाकर, इस सीट पर 19 में से 14 बार मुस्लिम उम्मीदवार विजयी रहे हैं।
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उम्मीदवार और रणनीतियां
इस बार तीन मुख्य उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। तृणमूल कांग्रेस ने स्वर्ण कमल साहा का टिकट काट दिया है और उनकी जगह उनके बेटे सांदीपन साहा मैदान में हैं। उनका कहना है कि बंगाल के लोग ‘दीदी के विकास’ के साथ हैं और भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व बंगाल के साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है।
भाजपा की ओर से अधिवक्ता प्रियंका टिबरेवाल मैदान में हैं। उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार से विशेष बातचीत में कहा कि बंगाल में विकास नहीं हुआ और मुस्लिम समुदाय को अनावश्यक रूप से प्राथमिकता दी जा रही है। उनका दावा है कि इस बार तृणमूल को हराना भाजपा के लिए संभव है।
लेफ्ट से अब्दुर रऊफ चुनावी मैदान में हैं। उनका कहना है कि इस बार मुकाबला दिलचस्प होगा, क्योंकि धार्मिक ध्रुवीकरण और भ्रष्टाचार न सिर्फ भाजपा बल्कि तृणमूल में भी फैला हुआ है। रऊफ का मानना है कि उनके लिए एंटाली में मौके हैं, खासकर तब जब भाजपा और तृणमूल दोनों पर मतदाताओं का असंतोष बढ़ा है।
वही, हुमायूं कबीर की पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी की ओर से शाह आलम भी चुनावी मैदान में हैं, जो स्थानीय सक्रिय नेता है और लोगों के बीच अच्छी पकड़ रखते हैं।
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मुकाबले के समीकरण और आगामी चुनाव की चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि तृणमूल कांग्रेस इस समय एंटाली में मजबूत स्थिति में है, लेकिन भाजपा और लेफ्ट के साथ मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। शहरी क्षेत्र होने के कारण मतदाता कम उत्साही रह सकते हैं, लेकिन स्थानीय मुद्दे, विकास की कहानी और धार्मिक-सामुदायिक समीकरण इस बार निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
सांदीपन साहा का विकास एजेंडा और लगातार जीत उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाता है, वहीं प्रियंका टिबरेवाल और अब्दुर रऊफ के लगातार आलोचनात्मक और चुनौतीपूर्ण रुख ने इस चुनाव को पहले से कहीं अधिक रोचक बना दिया है। पिछली बार तृणमूल ने आईएसएफ और भाजपा को पछाड़ा था, लेकिन इस बार सभी दलों के रणनीतिक समीकरण, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और समुदायिक मतों का बंटवारा चुनाव का रूप तय कर सकता है।
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क्या कहना है राजनीतिक विश्लेष्कों का ?
वरिष्ठ पत्रकार और लंबे समय से बंगाल की राजनीति पर नजर रखने वाले नरेश श्रीवास्तव ने एंटाली विधानसभा में भाजपा की जीत की संभावना जताई है। वह इसी इलाके में रहते हैं। उनका कहना है कि स्वर्ण कमल साहा के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा कार्यकर्ता की हत्या के मामले में वे कानूनी पचड़े का सामना कर चुके हैं। इसके अलावा एंटाली में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता हैं जो अब्दुर रउफ और शाह आलम के बीच बंट सकते हैं। इसलिए इसका लाभ भाजपा को मिलेगा और पार्टी जीत सकती है।
एंटाली विधानसभा सीट, अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ, इस बार 2026 चुनाव में राजनीतिक दृष्टि से भी एक दिलचस्प और पेचीदा मैदानी लड़ाई का गवाह बनने वाली है। मतदाताओं की नजर विकास, सुरक्षा और सामाजिक सामंजस्य पर होगी, और जीत का पैमाना नतीजों के बजाय उम्मीदवारों की छवि और रणनीतियों पर निर्भर करेगा।
हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर

