बालू संकट से थमी सालानपुर की रफ्तार, जिलाधिकारी कार्यालय में आपात बैठक
पश्चिम बर्दवान, 25 जून (हि. स.)। जिले के सालानपुर क्षेत्र में लगातार जारी बालू संकट अब स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ने लगा है। निर्माण उद्योग से लेकर छोटे व्यापार और दिहाड़ी मजदूरों तक इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए 24 जून बुधवार देर शाम को जिलाधिकारी कार्यालय में एक विशेष आपात बैठक आयोजित की गई, जिसमें जिले के सभी बीएलएलआरओ अधिकारी और 18 बालू घाट मालिक शामिल हुए। बैठक में बालू संकट के समाधान, कम कीमत पर उपलब्धता और ट्रैक्टरों के जरिए वैध परिवहन शुरू करने पर चर्चा की गई।
विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद से रूपनारायणपुर सहित पूरे सालानपुर इलाके में बालू की कमी लगातार बनी हुई है। हालांकि अजय नदी से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में बालू ट्रकों और डंपरों के जरिए राज्य के अन्य हिस्सों में भेजी जा रही है, लेकिन स्थानीय बाजार में इसकी उपलब्धता लगभग समाप्त हो गई है। इसका सबसे बड़ा असर निर्माण क्षेत्र पर पड़ा है।
निर्माण कार्य बंद होने से कई प्रमोटरों ने अपने परियोजना रोक दिए हैं, जिसके कारण हजारों राजमिस्त्री, मजदूर और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। साथ ही सीमेंट, सरिया, गिट्टी और अन्य निर्माण सामग्री के कारोबार पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। स्थानीय बाजार में आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ गई हैं और कई परिवार रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर रुख करने को मजबूर हो रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, सालानपुर ब्लॉक के चित्तरंजन–फतेपुर क्षेत्र में अजय नदी पर दो वैध बालू घाट मौजूद हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी प्रक्रिया के कारण इन घाटों से फिलहाल बालू निकासी बंद है। हालांकि संबंधित पक्षों द्वारा अदालत में प्रतिबंध हटाने की अपील की गई है।
इस बीच प्रशासन ने जीतपुर घाट से अवैध रूप से निकाली गई लगभग एक लाख 66 हजार सीएफटी बालू जब्त की है। इस बालू की नीलामी के लिए पश्चिम बर्दवान जिलाधिकारी से अनुमति मांगी गई है। उम्मीद की जा रही है कि अगले आठ से 10 दिनों के भीतर नीलामी प्रक्रिया पूरी होने पर स्थानीय स्तर पर कुछ राहत मिल सकती है।
दूसरी ओर बाराबनी क्षेत्र के दो चालू बालू घाटों से आपूर्ति हो रही है, लेकिन वहां से केवल बड़े डंपरों के जरिए परिवहन होने के कारण लागत काफी बढ़ गई है। 12 से 18 चक्का वाहनों के माध्यम से बालू लाने में 40 से 60 हजार रुपये तक खर्च हो रहा है, जो छोटे निर्माणकर्ताओं के लिए संभव नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अजय और दामोदर नदी के बालू की गुणवत्ता और कीमत में भी अंतर होता है। वर्तमान में बालू घाटों की नीलामी, दर निर्धारण और आवंटन की जिम्मेदारी पश्चिम बंगाल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के पास है। पहले यह जिम्मेदारी बीएलएलआरओ स्तर पर होती थी। अब जियोलॉजिकल सर्वे और विभिन्न तकनीकी प्रक्रियाओं के बाद ही घाटों का आवंटन किया जाता है, जिससे प्रक्रिया अधिक समय लेने वाली हो गई है।
सालानपुर क्षेत्र में पारंपरिक रूप से ट्रैक्टरों के जरिए बालू परिवहन होता रहा है, लेकिन अधिकांश ट्रैक्टरों के डाले का वैध लाइसेंस नहीं होने के कारण परिवहन बाधित हो रहा है। राज्य सरकार ने डाले का लाइसेंस अनिवार्य कर दिया है और प्रशासन इस नियम को लागू करने पर जोर दे रहा है।
आने वाले बरसात के मौसम में नदी से बालू निकासी पर प्रतिबंध लागू होने से पहले प्रशासन समाधान निकालने की कोशिश में है। बैठक में सरकारी निर्माण कार्यों और सड़क परियोजनाओं के लिए रियायती दरों पर बालू उपलब्ध कराने तथा जल्द से जल्द ट्रैक्टरों के जरिए वैध परिवहन शुरू करने पर सहमति बनी।
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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष विश्वकर्मा

