(विस चुनाव 2026) चांपदानी का चुनावी समीकरण बदल : मुद्दे भारी या सियासी रणनीति?
हुगली, 22 मार्च (हि. स.)। जिले की चांपदानी विधानसभा सीट इस बार महज राजनीतिक टक्कर तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय समस्याएं चुनावी विमर्श के केंद्र में आ गई हैं। डीवीसी खाल की गंदगी, मच्छरों का बढ़ता प्रकोप, जर्जर बुनियादी ढांचा और रोजगार का संकट यहां के मतदाताओं के लिए अहम मुद्दे बन चुके हैं।
इलाके से होकर गुजरने वाली डीवीसी खाल (नहर) की स्थिति लंबे समय से खराब है। इसमें जमा कचरा और ठहरा पानी अब गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या का रूप ले चुका है।
चांपदानी नगरपालिका के चेयरमैन सुरेश मिश्रा के अनुसार, खाल की लंबे समय से सफाई नहीं होने के कारण मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिससे हर साल डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा बना रहता है। मानसून के बाद खाल किनारे बसे इलाकों में हालात और खराब हो जाते हैं। मच्छरों का बढ़ता प्रकोप स्थानीय लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन चुका है। नगर पालिका द्वारा फॉगिंग और सफाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन कई वार्डों में इसका असर सीमित नजर आता है।
निवासियों का कहना है कि शाम के समय बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। बुनियादी ढांचे की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। कई इलाकों में सड़कें जर्जर हैं, नालियों की नियमित सफाई नहीं होती और जलनिकासी व्यवस्था कमजोर है। बारिश के दौरान जलभराव आम समस्या बन जाती है, जिससे लोगों का दैनिक जीवन प्रभावित होता है।
रोजगार का संकट भी चुनावी मुद्दों में प्रमुखता से उभरा है। चांपदानी और आसपास के क्षेत्रों में पहले सक्रिय कई छोटे-बड़े उद्योग बंद हो चुके हैं या कमजोर पड़ गए हैं जिससे स्थानीय युवाओं के रोजगार हेतु पलायन की प्रवृत्ति बढ़ी है।
चांपदानी की जनसंख्या संरचना भी चुनावी समीकरण को प्रभावित करती है। इस विधानसभा क्षेत्र में लगभग ढाई लाख मतदाता हैं, जिनमें अल्पसंख्यक समुदाय की हिस्सेदारी करीब 35 प्रतिशत मानी जाती है। इसके अलावा हिंदीभाषी, बंगाली और प्रवासी श्रमिकों का मिश्रित वोट बैंक चुनाव को बहुआयामी बनाता है।
ऐसे परिदृश्य में तृणमूल कांग्रेस के अरिंदम गुईन, भाजपा के दिलीप सिंह और माकपा के चंद्रनाथ बनर्जी के बीच मुकाबला दिलचस्प हो गया है। हालांकि कांग्रेस ने अब तक अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है, जिससे उसके समर्थकों और संभावित वोट बैंक में अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है।
उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि भी इस चुनाव को रोचक बनाती है। अरिंदम गुईन स्नातक हैं और उनकी मजबूत सांगठनिक पकड़ मानी जाती है। भाजपा के दिलीप सिंह दसवीं पास हैं, लेकिन “बाहरी उम्मीदवार” का मुद्दा और पार्टी के भीतर गुटबाजी उनके लिए चुनौती बन रही है। वहीं, चंद्रनाथ बनर्जी पेशे से अधिवक्ता हैं और मजदूरों के मुद्दों को उठाने के लिए जाने जाते हैं, हालांकि माकपा की कमजोर सांगठनिक स्थिति उनके लिए बाधा बनी हुई है।
पिछले चुनावी आंकड़े इस सीट के बदलते राजनीतिक मिजाज को दर्शाते हैं। वर्ष 2011 में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच गठबंधन था, जिसके तहत तृणमूल कांग्रेस ने करीब 57 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, जबकि माकपा को लगभग 35 प्रतिशत और भाजपा को करीब पांच प्रतिशत वोट मिले थे।
वर्ष 2016 में वाम-कांग्रेस गठबंधन के तहत कांग्रेस को करीब 44 प्रतिशत वोट मिले, जबकि तृणमूल कांग्रेस को लगभग 40 प्रतिशत और भाजपा को करीब 13 प्रतिशत वोट हासिल हुए।
2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने बढ़त बनाते हुए करीब 50 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि भाजपा का वोट शेयर बढ़कर लगभग 35 प्रतिशत हो गया। कांग्रेस का वोट शेयर घटकर करीब 11 प्रतिशत रह गया। उल्लेखनीय है कि 2016 और 2021 में वाम और कांग्रेस के बीच गठबंधन का असर चुनावी नतीजों पर पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार भाजपा के सामने अंदरूनी गुटबाजी एक बड़ी चुनौती बन सकती है, जबकि तृणमूल कांग्रेस अपनी सांगठनिक मजबूती के सहारे बढ़त बनाए रखने की कोशिश में है। माकपा के लिए यह चुनाव अपने खोए जनाधार को पुनर्जीवित करने का अवसर माना जा रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय पाण्डेय

