home page

बर्दवान विश्वविद्यालय में समान नागरिक संहिता पर सेमिनार

 | 

पूर्व बर्दवान, 21 अगस्त (हि. स.)। बर्दवान विश्वविद्यालय के गोलापबाग स्थित पूर्व छात्र सभागार में शुक्रवार को समान नागरिक संहिता विषय पर एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के विधि विभाग तथा कोलकाता की न्याय के लिए नागरिक संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में समान नागरिक संहिता के संवैधानिक, कानूनी और सामाजिक पक्षों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन पश्चिम बंगाल सरकार की उद्योग राज्य मंत्री मौमिता विश्वास मिश्रा तथा बर्दवान विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ. शंकर कुमार नाथ ने किया। इस अवसर पर विधि क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।

सेमिनार के प्रमुख वक्ताओं में कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति डॉ. संबुद्ध चक्रवर्ती तथा कोलकाता स्थित गोयनका वाणिज्य एवं व्यवसाय प्रशासन महाविद्यालय के विधि विषय के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रेम कुमार अग्रवाल शामिल रहे।

कार्यक्रम के दौरान समान नागरिक संहिता से जुड़े विभिन्न संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर चर्चा की गई। विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 44 में उल्लिखित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के संदर्भ में समान नागरिक संहिता की अवधारणा को समझने का प्रयास किया गया।

वक्ताओं ने विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति तथा गोद लेने जैसे व्यक्तिगत विधि से जुड़े विषयों में समान कानूनी व्यवस्था की संभावनाओं पर विचार रखे। साथ ही इस बात पर भी चर्चा हुई कि व्यक्तिगत कानूनों और समान नागरिक संहिता के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है तथा इसका समाज के विभिन्न वर्गों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। सेमिनार में समानता, न्याय और संवैधानिक मूल्यों के साथ-साथ सामाजिक विविधता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर भी विचार-विमर्श हुआ। वक्ताओं ने इस विषय को केवल कानूनी दृष्टिकोण से देखने के बजाय इसके सामाजिक प्रभावों और व्यावहारिक पक्षों पर भी चर्चा की।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति डॉ. संबुद्ध चक्रवर्ती ने समान नागरिक संहिता के ऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भों पर प्रकाश डालते हुए विषय पर गंभीर एवं रचनात्मक विमर्श की आवश्यकता पर जोर दिया। इससे पहले जुलाई में कोलकाता में आयोजित एक अन्य संगोष्ठी में भी उन्होंने समान नागरिक संहिता के ऐतिहासिक विकास, संवैधानिक दायित्व और वर्तमान संदर्भ पर चर्चा की थी।

बर्दवान विश्वविद्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में विधि के विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने भी विषय को लेकर अपनी जिज्ञासाएं और विचार सामने रखे। इससे सेमिनार केवल वक्ताओं के संबोधन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच विचारों के आदान-प्रदान का अवसर भी बना।

आयोजकों के अनुसार, समान नागरिक संहिता जैसे व्यापक संवैधानिक विषय पर विश्वविद्यालय स्तर पर इस प्रकार के विमर्श का उद्देश्य विद्यार्थियों को कानून और समाज के बीच संबंधों को समझने का अवसर प्रदान करना है। साथ ही संवैधानिक प्रावधानों, व्यक्तिगत विधियों और सामाजिक वास्तविकताओं के बीच संबंधों पर गंभीर चर्चा को बढ़ावा देना भी इसका महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संतोष विश्वकर्मा