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संस्कृत भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे सशक्त संवाहक: डॉ. विश्वेश

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हरिद्वार, 03 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थान की ओर से संस्कृत भाषा के वैश्विक प्रचार-प्रसार, आधुनिक संवर्धन और वैज्ञानिक संरक्षण को लेकर ऑनलाइन संस्कृत व्याख्यान माला का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में संस्कृत के आधुनिक और व्यावहारिक पक्षों के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में इसकी भूमिका पर विशेषज्ञों ने विचार रखे।

मुख्य वक्ता हेमवती नंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विश्वेश वाग्मी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारत को उसकी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण अभियान है। संस्कृत को केवल कर्मकांड या पूजा-पद्धति की भाषा मानना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत कम्प्यूटर विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, गणित, खगोल विज्ञान सहित प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा की सशक्त संवाहक रही है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को प्रभावी ढंग से धरातल पर उतारने के लिए प्राथमिक स्तर से ही मातृभाषा के साथ ‘खेल-खेल में संस्कृत’ की अवधारणा को बढ़ावा देना होगा। उन्होंने त्रिभाषा सूत्र में संस्कृत को महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में शामिल किए जाने का भी उल्लेख किया।

संस्कृत भारती उत्तराखंड के प्रांत संगठन मंत्री गौरव शास्त्री ने संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने के लिए इसे व्यवहार और संवाद की भाषा बनाने पर जोर दिया। उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. अरविंद नारायण मिश्र ने कहा कि संस्कृत विद्यार्थियों को केवल पारंपरिक ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय अंतर्विषयक शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए। इससे संस्कृत के विद्यार्थी तकनीकी, पत्रकारिता, विधि और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर हासिल कर सकेंगे।

संस्थान के सचिव प्रो. विनय कुमार विद्यालंकार ने आभार व्यक्त करते हुए संस्थान द्वारा सुदूर क्षेत्रों तक संस्कृत पहुंचाने के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। संचालन एवं तकनीकी संयोजन डॉ. वेदव्रत एवं डॉ. शिवदेव आर्य ने किया। ऑनलाइन संगोष्ठी में देश-विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से शोधार्थियों, प्राध्यापकों, प्राचार्यों और संस्कृत अनुरागियों ने प्रतिभाग किया।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला