सांस्कृतिक व पारिस्थितिक विरासत पर गोलमेज सम्मेलन आयोजित
देहरादून, 24 मार्च (हि.स.)। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में मंगलवार को सांस्कृतिक और पारिस्थितिक विरासत के संरक्षण पर एक अंतरराष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलनआयोजित किया गया। यह कार्यक्रम इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इन्टैक) ने वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के सहयोग से और दून पुस्तकालय एवं रोहिणी नीलेकानी फिलैंथ्रोपीज़ की साझेदारी में आयोजित किया गया।
सम्मेलन में संस्कृति और प्रकृति के अंतर्संबंध को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सीमा पार विरासत के मानचित्रण पर विचार-विमर्श किया गया। परियोजना के तहत मौखिक परंपराओं, अनुष्ठानों और स्वदेशी वन प्रथाओं जैसी अमूर्त विरासत पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया, जो मानव और हाथी के संबंधों को दर्शाती हैं। उत्तराखंड की सह-संयोजक अंजली भारथारी ने बताया कि सांस्कृतिक ज्ञान को पारिस्थितिक लक्ष्यों के साथ जोड़कर यह पहल एशियाई हाथियों के सुरक्षित आवागमन मार्गों को सुनिश्चित करने में सहायक होगी। उन्होंने कहा कि ‘गज उत्सव-गज लोक’ जैसे मंच मानव-हाथी संघर्ष और पर्यावास विखंडन जैसी चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
सत्र की अध्यक्षता उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष मेजर जनरल आनंद सिंह रावत (सेवानिवृत्त) ने की। इस अवसर पर वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया की प्रतिनिधि सायमंती बी ने ‘पवित्र भूदृश्य, साझा भविष्य’ विषय पर विचार रखे, जबकि अनुरंजन रॉय ने दक्षिण एशिया में हाथियों के सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व पर प्रकाश डाला।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के देहरादून सर्कल प्रमुख डॉ. मोहन जोशी ने सांस्कृतिक स्मृति और जीवंत भूदृश्यों में हाथियों की भूमिका पर चर्चा की। वहीं, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के डॉ. ए.के. सिंह ने पारिस्थितिक गलियारों और कनेक्टिविटी योजना में सांस्कृतिक मानचित्रण के समावेश की आवश्यकता पर जोर दिया।
पर्यावरणविद् रेनू पॉल ने शिवालिक हाथी अभ्यारण्य पर बढ़ते विकासात्मक दबावों से उत्पन्न खतरों की ओर ध्यान दिलाया। उत्तराखंड वन विभाग के अधिकारियों ने राज्य में चल रही संरक्षण पहलों और चुनौतियों की जानकारी साझा की।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों के बीच संवादात्मक चर्चा भी हुई, जिसमें विभिन्न विशेषज्ञों और प्रतिभागियों ने अपने विचार साझा किए।
संयोजक भारती जैन ने बताया कि इस श्रृंखला के अंतर्गत आगामी कार्यक्रम 25 मार्च को दून विश्वविद्यालय में और 15 अप्रैल को स्कूली छात्रों के लिए आयोजित किए जाएंगे।
इस अवसर पर पर्यावरणविदों, वन्यजीव विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों तथा विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय

