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12 साल बाद निर्जन हिमालयी पड़ावों में गूंजे नंदा के जयकारे, पातर नौचयनिया पहुंची बड़ी जात

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12 साल बाद निर्जन हिमालयी पड़ावों में गूंजे नंदा के जयकारे, पातर नौचयनिया पहुंची बड़ी जात


-चैसिंघा मेंढ़े की अगुवाई में पातर नौचयनिया पहुंची बड़ी जात, चटक धूप से खिले श्रद्धालुओं के चेहरे

गोपेश्वर, 18 सितंबर (हि.स.)। बारह साल से जिस पल का इंतजार था, वह शुक्रवार को फिर आया। मां नंदा की बड़ी जात हिमालय के निर्जन पड़ावों को जयकारों से गुंजाती हुई वेदनी कुंड में पूजा-अर्चना के बाद कैलुवा विनायक होते हुए पातर नौचयनिया पहुंची। चैसिंघा मेंढ़े की अगुवाई में निकली यात्रा में दशोली नंदा और बंड नंदा की डोलियों के साथ बंड भूमियाल, गेदाणु देवता समेत दर्जनों छंतोलियां और सैकड़ों श्रद्धालु शामिल रहे।

पातर नौचयनिया पहुंचने पर लंबे समय से पसरा हिमालय का सन्नाटा मां नंदा के जयकारों से टूट गया। पिछले दिनों बारिश और खराब मौसम के बीच शुक्रवार को चटक धूप खिलने से दुर्गम रास्तों से पहुंचे श्रद्धालुओं के चेहरे भी खिल उठे। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में धूप से ठंड और नमी से कुछ राहत मिली और श्रद्धालु उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहे।

वेदनी बुग्याल से पातर नौचयनिया तक का सफर बड़ी जात के लिए कठिन पहाड़ी रास्तों को पार करने के साथ ही 12 साल में एक बार जीवंत होने वाली परंपरा से जुड़ा है। डोलियों, छंतोलियों और देव निशानों के साथ चल रहे श्रद्धालु जागर और लोकगीत गाते हुए आगे बढ़े। निर्जन पड़ावों में जगह-जगह मां नंदा और बंड भूमियाल के जयकारे गूंजते रहे।

बारह साल बाद मां नंदा की डोली के निर्जन हिमालयी पड़ावों में पहुंचने से इन ऊंचाइयों पर एक बार फिर आस्था और लोक संस्कृति का रंग दिखाई दिया। वहीं, बुग्यालों में खिले ब्रह्मकमल ने यात्रा की खूबसूरती में और इजाफा किया।

अब शिला समुद्र की कठिन डगर

पातर नौचयनिया में रात्रि विश्राम के बाद बड़ी जात शनिवार को छेड़ी नाग, रूपकुंड, ज्यूरां गौली और थाला उलारी होते हुए शिला समुद्र पहुंचेगी। इसके साथ ही यात्रा और अधिक दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में प्रवेश करेगी।

ऊंचाई, बदलता मौसम और कठिन भूभाग के बीच श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ आगे बढ़ेंगे।

इंसेट : ब्रह्मकमल ने बढ़ाई हिमालय की खूबसूरती

बड़ी जात के रास्ते में इस बार ब्रह्मकमल की प्रचुरता श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। कैलुवा विनायक से भगुवावासा तक जगह-जगह खिले ब्रह्मकमल को देखकर श्रद्धालु अभिभूत हैं।

पर्यावरण प्रेमी चंदन नयाल के अनुसार, इस बार हिमालयी परिक्षेत्र में लंबे समय बाद इतनी बड़ी संख्या में ब्रह्मकमल खिले हैं।

बंड मंदिर समिति के सचिव रघुनाथ सिंह फरस्वाण ने बताया कि मां नंदा की बड़ी जात, नंदाष्टमी और अन्य पर्वों पर ब्रह्मकमल से मां नंदा की पूजा की परंपरा है। पंचकेदारों में भी इस पुष्प से भगवान शिव की पूजा की जाती है। बड़ी जात में ब्रह्मकमल को विशेष प्रसाद के रूप में भी श्रद्धा से ग्रहण किया जाता है।

पहली बार बड़ी जात में शामिल हुए जेन-जी युवा

इस बार बड़ी जात में नई पीढ़ी की भागीदारी भी आकर्षण का केंद्र है।

पहली बार यात्रा में शामिल हुए जेन-जी युवा मुकेश फरस्वाण, उपेंद्र बिष्ट और सुनील झिंकवाण वेदनी बुग्याल, पातर नौचयनिया, कैलुवा विनायक और भगुवावासा की प्राकृतिक सुंदरता से अभिभूत नजर आए। उनके लिए यह यात्रा पहाड़ की परंपरा और हिमालय को करीब से जानने का नया अनुभव बनी हुई है।

हिन्दुस्थान समाचार / जगदीश पोखरियाल