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12 बरस बाद होली भेंट, ‘जा मेरी गौरा जा तू शिव का कैलाश’

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12 बरस बाद होली भेंट, ‘जा मेरी गौरा जा तू शिव का कैलाश’


गोपेश्वर, 20 सितम्बर (हि.स.)। मेरी मैत की धियाणी, तेरू बाटू हेरदू रोली... जा मेरी गौरा जा तू शिव का कैलाश...’ लोकगीतों और जागरों की गूंज के बीच रविवार को होमकुंड में मां नंदा की कैलाश विदाई हुई। 12 बरस बाद अपनी ध्याणी को ससुराल कैलाश विदा करते हुए श्रद्धालुओं की आंखें छलछला उठीं। मां नंदा और बंड भूमियाल के जयकारों से पूरा हिमालय गूंज उठा। इसी के साथ करीब 15 दिन से चल रही मां नंदा की ऐतिहासिक बड़ी जात का समापन हो गया।

अंतिम पड़ाव शीला समुद्र से होमकुंड पहुंची बड़ी जात में श्रद्धालुओं ने मां नंदा की पूजा-अर्चना की। इसके बाद पौराणिक लोकगीतों और जागरों के बीच ध्याणी को विदाई दी गई। श्रद्धालुओं ने अपने साथ लाए खाजा-चूड़ा, बिंदी, चूड़ी, ककड़ी और मुंगरी समेत अन्य सामग्री समौण के रूप में मां नंदा को अर्पित की।

चैसिंगा खाडू भी कैलाश रवानाबड़ी जात की अगुवाई कर रहे चैसिंगा खाडू की भी होमकुंड में पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद उसे कैलाश की ओर रवाना किया गया। चैसिंगा खाडू की विदाई के समय श्रद्धालु भावुक हो उठे। मान्यता के अनुसार खाडू मां नंदा के साथ कैलाश की ओर जाता है।

डोलियां-निशाण और छंतोलियां लौटीमां नंदा की कैलाश विदाई के साथ ही बड़ी जात में शामिल डोलियां, निशाण और छंतोलियों ने वापसी की राह पकड़ ली। श्रद्धालु भी हिमालय से लौटने लगे। रविवार रात चंदनियाघाट-जामुन डाली में विश्राम के बाद सोमवार को जत्थे के सुतोल पहुंचने की तैयारी है।

नंदा विदा हुईं, हिमालय में ठंड की दस्तकबड़ी जात के समापन के साथ ही उच्च हिमालय में मौसम बदलने की शुरुआत भी मानी जाती है। डोलियों और छंतोलियों की वापसी के साथ बुग्यालों की हरी घास पीली पड़ने लगती है। भेड़-बकरी पालक भी धीरे-धीरे अपने पशुओं के साथ निचले इलाकों की ओर लौटने लगते हैं।

बड़ी जात खत्म, खेतों में लौटे ग्रामीणनंदा की बड़ी जात के समापन के बाद सीमांत चमोली के गांवों में भी रौनक लौट आई है। ग्रामीण अब धान की कटाई और मंडाई में जुट गए हैं। जंगली जानवरों से बची फसल को समेटने में परिवार दिन-रात लगे हैं। करीब एक पखवाड़े तक नंदा की यात्रा में शामिल रहने के बाद ग्रामीण अब अपनी खेती-किसानी की दिनचर्या में लौट आए हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / जगदीश पोखरियाल