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कानून से आगे बढ़कर बच्चे के पुनर्वास पर जोर, किशोर न्याय व्यवस्था की एक दशक की समीक्षा

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कानून से आगे बढ़कर बच्चे के पुनर्वास पर जोर, किशोर न्याय व्यवस्था की एक दशक की समीक्षा


हरिद्वार, 20 सितंबर (हि.स.)। किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के क्रियान्वयन के एक दशक की समीक्षा और भविष्य की दिशा तय करने के लिए रविवार को बहादराबाद स्थित हयात प्लेस में राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श आयोजित किया गया। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की किशोर न्याय समिति ने महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में बाल संरक्षण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर व्यापक मंथन किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इस दौरान मातृ आंचल कन्या विद्यालय, राजागार्डन की छात्राओं और राजकीय बाल देखरेख गृह, रोशनाबाद की बालिकाओं ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। बच्चों को न्यायाधीशों की धर्मपत्नियों ने उपहार देकर सम्मानित किया।

अध्यक्षीय संबोधन में मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता ने कहा कि किसी भी कानून की सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि बच्चों के विकास को टाला नहीं जा सकता और अधिनियम के उद्देश्यों को जमीन पर उतारने के लिए सभी संबंधित संस्थाओं को व्यावहारिक और क्रियान्वयन-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना होगा।

किशोर न्याय समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने अधिनियम के दस वर्षों की यात्रा की समीक्षा करते हुए कहा कि विधि के साथ संघर्ष की स्थिति में आने वाला या देखरेख एवं संरक्षण की जरूरत वाला बच्चा सबसे पहले बच्चा है। उन्होंने कहा कि ऐसे बच्चे को दंड से अधिक पुनर्वास और अलगाव के बजाय समाज में पुनः एकीकरण की आवश्यकता है। उन्होंने संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय को किशोर न्याय व्यवस्था की सफलता के लिए जरूरी बताया।

न्यायमूर्ति आलोक महरा ने कहा कि न्याय में देरी का बच्चे के जीवन और भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने समयबद्ध और बाल-केंद्रित न्यायिक प्रक्रिया को आवश्यक बताया। न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय ने सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि उत्तराखंड के दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों तक भी गरिमा, संरक्षण, देखरेख और आवश्यक सहयोग पहुंचना चाहिए।

पांच तकनीकी सत्रों में हुआ गहन मंथन

परामर्श में 180 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल एवं अन्य रजिस्ट्रार, विधि एवं विधिक परामर्श से जुड़े अधिकारी, महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पॉक्सो एवं एफटीएससी न्यायालयों के न्यायाधीश, किशोर न्याय बोर्डों के प्रधान मजिस्ट्रेट तथा पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण और पंचायती राज विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल रहे।

दिनभर चले कार्यक्रम में पांच तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें दत्तक ग्रहण, देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे, विधि के साथ संघर्षरत बच्चे, प्रारंभिक मूल्यांकन तथा किशोर न्याय अधिनियम-2015 के समग्र अवलोकन जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने विचार रखे।

विभिन्न सत्रों में निदेशक उजाला प्रदीप पंत, सचिव महिला कल्याण एवं बाल विकास चंद्रेश यादव, सीईओ कारा भावना सक्सेना, आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती, राजीव भल्ला, संगीता गौड़, अधिवक्ता स्नेहा सिंह, इंडिपेंडेंट थॉट के संस्थापक विक्रम श्रीवास्तव, स्पेशल होम्स रोशनाबाद के अधीक्षक विजय दीक्षित और पूर्व चेयरपर्सन एचडब्ल्यूसी देहरादून रघुवरदत्त तिवारी ने विशेषज्ञ वक्ता के रूप में योगदान दिया।

कार्यक्रम के सफल आयोजन में जिला न्यायाधीश हरिद्वार नरेन्द्र दत्त, किशोर न्याय समिति के रजिस्ट्रार/सचिव विक्रम और जिलाधिकारी मयूर दीक्षित के नेतृत्व में जिला न्यायालय एवं जिला प्रशासन की सक्रिय भागीदारी रही।

उद्घाटन सत्र का समापन उत्तराखंड उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल योगेश कुमार गुप्ता के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। उन्होंने सभी प्रतिभागियों से प्रत्येक बच्चे के लिए सुरक्षित, स्नेहपूर्ण और पोषणकारी वातावरण तैयार करने की दिशा में मिलकर काम करने का आह्वान किया।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला