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‘मानव शिक्षा’ पर विचार-विमर्श, सह-अस्तित्व दर्शन पर जोर

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‘मानव शिक्षा’ पर विचार-विमर्श, सह-अस्तित्व दर्शन पर जोर


देहरादून, 08 अप्रैल (हि.स.)। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में ‘मानव शिक्षा: आवश्यकता, प्रक्रिया और उपलब्धि’ विषय पर बुधवार को केन्द्र के सभागार में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में मध्यस्थ दर्शन के प्रबोधक राजेश बहुगुणा ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए सह-अस्तित्व दर्शन के आलोक में मानव शिक्षा की प्रकृति और उसके उद्देश्यों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मानव का समग्र अध्ययन किए बिना मानव शिक्षा की योजना अधूरी रहती है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य का प्रत्येक प्रयास सुख की प्राप्ति के लिए होता है और इसी उद्देश्य से वह शिक्षा ग्रहण करता है, किंतु अब तक मानव के संपूर्ण स्वरूप का समुचित अध्ययन नहीं हो पाया है। उन्होंने विज्ञान और धार्मिक दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि विज्ञान ने मानव को केवल भौतिक शरीर के रूप में देखा, जबकि धार्मिक मान्यताओं ने उसे आत्मा के रूप में परिभाषित किया, जिससे शिक्षा का संतुलन प्रभावित हुआ है।

उन्होंने कहा कि विज्ञान आधारित शिक्षा ने भौतिक सुविधाओं को बढ़ावा दिया, जबकि धार्मिक दृष्टिकोण ने आध्यात्मिक पक्ष को प्राथमिकता दी। इन दोनों के बीच संतुलन के अभाव ने सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियों को जन्म दिया है।

मुख्य वक्ता ने कहा कि मानव एक साथ भौतिक और भावनात्मक दोनों स्वरूपों में अस्तित्व रखता है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में इन दोनों पहलुओं का समावेश आवश्यक है, ताकि समग्र विकास सुनिश्चित किया जा सके।

कार्यक्रम से पूर्व दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने अतिथि वक्ता का स्वागत एवं परिचय प्रस्तुत किया। इस अवसर पर लेखक, सामाजिक चिंतक, युवा पाठक एवं शहर के विभिन्न वर्गों के लोग उपस्थित रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय