देवभूमि की संस्कृति और पौराणिक विरासत की रक्षा के लिए बने हिमालय : आनन्द स्वरूप
हरिद्वार, 10 जून (हि.स.)। शांभवी पीठाधीश्वर एवं काली सेना प्रमुख स्वामी आनन्द स्वरूप महाराज ने देवभूमि उत्तराखण्ड की पौराणिक विरासत, धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक अस्मिता एवं आध्यात्मिक स्वरूप को सुरक्षित बनाए रखने के लिए एक विशेष कानून हिमालय-देवालय प्रोटेक्शन एक्ट बनाए जाने की जोरदार वकालत की है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड केवल एक राज्य नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति, ऋषि परंपरा, तपोभूमि और देवभूमि के रूप में पूरे विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। ऐसे में इसकी मूल आत्मा और सांस्कृतिक स्वरूप को सुरक्षित रखना सरकार और समाज दोनों की सामूहिक जिम्मेदारी है।
हरिद्वार में पत्रकारों से बातचीत करते हुए स्वामी आनन्द स्वरूप महाराज ने कहा कि उत्तराखण्ड के पवित्र धाम, मंदिर, आश्रम, तीर्थस्थल, नदियां और हिमालय क्षेत्र भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिक चेतना के जीवंत प्रतीक हैं। लेकिन तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश, बढ़ते व्यावसायीकरण और सांस्कृतिक चुनौतियों के कारण देवभूमि की मूल पहचान प्रभावित हो रही है।
उन्होंने कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को उत्तराखण्ड की पुरातन आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत देखने को नहीं मिलेगी।
सउन्होंने कहा कि हिमालय-देवालय प्रोटेक्शन एक्ट का उद्देश्य केवल धार्मिक स्थलों की सुरक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके माध्यम से देवभूमि की संपूर्ण सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संरचना को संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रदेश के प्राचीन मंदिरों, मठों, आश्रमों, धार्मिक परंपराओं, लोक संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा के लिए विशेष कानूनी व्यवस्था आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित एक्ट के अंतर्गत देवभूमि में मुस्लिमों के स्थायी निवास पर प्रतिबंध लगाने, शराब की बिक्री और सेवन पर पूर्ण रोक लगाने तथा मांसाहार पर प्रतिबंध जैसे प्रावधान शामिल किए जाने चाहिए। उनका कहना था कि उत्तराखण्ड की पहचान एक धार्मिक और आध्यात्मिक प्रदेश के रूप में है, इसलिए यहां ऐसे सभी कार्यों पर नियंत्रण होना चाहिए जो इसकी सांस्कृतिक और धार्मिक गरिमा को प्रभावित करते हैं।
स्वामी आनन्द स्वरूप महाराज ने दावा किया कि उन्होंने स्वयं हिमालय-देवालय प्रोटेक्शन एक्ट के एक प्रारंभिक खाके पर कार्य किया है। उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार इस दिशा में गंभीरता से पहल करती है तो वह अपने सुझाव और अनुभव उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि इस एक्ट को लागू करने के लिए संत समाज, धार्मिक संस्थाओं, संस्कृति विशेषज्ञों, इतिहासकारों और समाज के विभिन्न वर्गों से व्यापक संवाद स्थापित किया जा सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला

