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उत्तराखंड में गुटखा-पान मसाले पर प्रतिबंध, फिर भी चुनौती बरकरार

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उत्तराखंड में गुटखा-पान मसाले पर प्रतिबंध, फिर भी चुनौती बरकरार


देहरादून, 14 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तराखंड में गुटखा, पान मसाला और तंबाकू व निकोटिन युक्त खाद्य उत्पादों पर एक साल की रोक के बाद अब इसके प्रभावी क्रियान्वयन की परीक्षा होगी। राज्य में 2013, 2015 और 2019 में भी तंबाकू युक्त खाद्य उत्पादों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसके बावजूद तंबाकू सेवन की चुनौती बनी हुई है। ऐसे में इस बार प्रतिबंध को बाजार में कितना प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, इस पर नजर रहेगी।

खाद्य सुरक्षा आयुक्त की ओर से 13 अक्टूबर को जारी आदेश के तहत संबंधित उत्पादों के निर्माण, भंडारण, वितरण और बिक्री पर एक साल के लिए प्रतिबंध लगाया गया है। आदेश में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30(2)(ए) और खाद्य सुरक्षा एवं मानक (विक्रय प्रतिबंध और निर्बंधन) विनियम, 2011 के विनियम 2.3.4 का उल्लेख किया गया है। आदेश की प्रतियां मुख्य सचिव, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग, सभी जिलाधिकारियों, मुख्य चिकित्सा अधिकारियों और खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन के संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी गई हैं।

उत्तराखंड में तंबाकू सेवन की स्थिति समझने के लिए भारत सरकार के ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वेक्षण (जीएटीएस-2) के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। वर्ष 2016-17 में किए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के 26.5 प्रतिशत वयस्क किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते थे। इनमें 12.4 प्रतिशत लोग बिना धुएं वाले तंबाकू का इस्तेमाल करते थे। सर्वेक्षण में गुटखा सेवन करने वालों का अनुपात 2.2 प्रतिशत और तंबाकू युक्त पान मसाले का सेवन करने वालों का अनुपात 3.1 प्रतिशत दर्ज किया गया था।

प्रतिबंध का प्रभाव केवल खुदरा दुकानों पर कार्रवाई से सुनिश्चित नहीं होगा। इसके लिए निर्माण इकाइयों, थोक विक्रेताओं, गोदामों और वितरण केंद्रों पर भी निगरानी रखनी होगी। प्रतिबंधित उत्पादों की आपूर्ति के स्रोतों की पहचान, नियमित निरीक्षण और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई के जरिए ही आदेश को प्रभावी बनाया जा सकता है।

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां भी निगरानी के काम को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। मैदानी क्षेत्रों के बड़े बाजारों से लेकर पर्वतीय जिलों के दूरस्थ कस्बों तक नियमित निरीक्षण और विभागीय समन्वय जरूरी होगा। प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रतिबंधित उत्पाद चोरी-छिपे या अन्य वितरण माध्यमों से बाजार में उपलब्ध न रहें। खाद्य सुरक्षा आयुक्त के आदेश में निरीक्षण, जब्ती या उल्लंघन के मामलों से संबंधित आंकड़े नहीं दिए गए हैं। ऐसे में प्रतिबंध के वास्तविक असर का आकलन आगे होने वाली कार्रवाई और उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकेगा।

तंबाकू का सेवन मुंह के कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ाता है। निकोटिन लत पैदा करने वाला पदार्थ है। इसलिए प्रतिबंध के साथ जनजागरूकता अभियान चलाना भी महत्वपूर्ण होगा। स्कूलों, शैक्षणिक संस्थानों और स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से किशोरों और युवाओं को तंबाकू के दुष्प्रभावों की जानकारी दी जा सकती है। साथ ही, तंबाकू की लत छोड़ने के इच्छुक लोगों को स्वास्थ्य परामर्श उपलब्ध कराना उपयोगी होगा।

कारोबारियों को प्रतिबंध के दायरे और संबंधित कानूनी प्रावधानों की स्पष्ट जानकारी देना भी आवश्यक है, ताकि नियमों को लेकर भ्रम की स्थिति न रहे और विभिन्न जिलों में कार्रवाई में एकरूपता बनी रहे।

एक साल बाद सामने आएगी प्रभावशीलता

13 अक्टूबर 2026 से लागू एक वर्षीय प्रतिबंध की अवधि में राज्य के सामने प्रतिबंधित उत्पादों की उपलब्धता पर नियंत्रण और तंबाकू सेवन के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दोहरी चुनौती होगी।

एक साल बाद निरीक्षण, जब्ती, नियमों के उल्लंघन, बाजार में प्रतिबंधित उत्पादों की उपलब्धता और जागरूकता अभियानों से जुड़े आंकड़ों की समीक्षा से इसकी प्रभावशीलता का आकलन किया जा सकेगा। पुराने प्रतिबंधों के अनुभवों से सबक लेते हुए इस बार निगरानी और प्रवर्तन की व्यवस्था कितनी मजबूत बनाई जाती है, यही इस फैसले की वास्तविक परीक्षा होगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय