गढ़वाली बोली में हुआ ‘चक्रव्यूह’ का मंचन
-अक्षत नाट्य संस्था की प्रस्तुति ने जीवंत किया अभिमन्यु के शौर्य और कौरवों की युद्धनीति का प्रसंग
गोपेश्वर, 25 अक्टूबर (हि.स.)। चमोली जिला मुख्यालय गोपेश्वर में पहली बार गढ़वाली बोली में चक्रव्यूह का मंचन किया गया। अक्षत नाट्य संस्था के तत्वावधान में डॉ. डीआर पुरोहित के दिशा-निर्देशन में प्रस्तुत इस नाट्य मंचन को देखने के लिए दूरदराज के क्षेत्रों से सैकड़ों लोग पहुंचे। महाभारत के युद्ध में रचे गए चक्रव्यूह और उसमें अभिमन्यु के प्रवेश की कथा को स्थानीय बोली में मंच पर उतारकर कलाकारों ने दर्शकों को महाभारत के एक महत्वपूर्ण प्रसंग से रूबरू कराया।
महाभारत में चक्रव्यूह एक जटिल युद्ध-रचना थी, जिसे शत्रु सेना को घेरने, भ्रमित करने और उसके योद्धाओं को अलग-थलग करने के उद्देश्य से बनाया जाता था। इसकी संरचना कई घेरों वाली मानी जाती है। इसमें प्रवेश करना जितना कठिन था, उससे बाहर निकलना उससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण था। इसे भेदने के लिए युद्धकौशल, रणनीति और व्यूह की बनावट का गहरा ज्ञान जरूरी था।
महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरव सेना ने पांडवों को कमजोर करने के उद्देश्य से चक्रव्यूह की रचना की थी। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि का ज्ञान था, लेकिन उससे बाहर निकलने की पूरी प्रक्रिया का ज्ञान नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने युद्धभूमि में प्रवेश कर कौरव सेना के महारथियों का सामना किया। चक्रव्यूह में घिरने के बाद अनेक महारथियों से संघर्ष करते हुए अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए। यह प्रसंग महाभारत के सबसे मार्मिक और वीरतापूर्ण प्रसंगों में गिना जाता है।
गोपेश्वर में हुए मंचन की खासियत महाभारत के इस प्रसंग को गढ़वाली बोली में प्रस्तुत करना रहा। स्थानीय भाषा के माध्यम से कथा को दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। डॉ. डीआर पुरोहित के निर्देशन में अक्षत नाट्य संस्था की इस प्रस्तुति को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोगों का पहुंचना आयोजन के प्रति दर्शकों की रुचि को दर्शाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / जगदीश पोखरियाल

