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अविरल-निर्मल गंगा के लिए जनभागीदारी जरूरी : डॉ. शैलेन्द्र

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अविरल-निर्मल गंगा के लिए जनभागीदारी जरूरी : डॉ. शैलेन्द्र


-जलस्रोत बचेंगे, तभी नदियां और पर्यावरण सुरक्षित रहेंगे : राम सिंह कैड़ा

-छोटी धाराओं और जलस्रोतों के संरक्षण पर जोर : रामाशीष

देहरादून, 12 सितंबर (हि. स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रांत प्रचारक डॉ. शैलेन्द्र ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। अविरल-निर्मल गंगा के लिए सरकार के साथ-साथ समाज, स्वयंसेवी संस्थाओं और धार्मिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है। यदि जल उपलब्ध नहीं रहेगा तो जीवन भी सुरक्षित नहीं रह सकता, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को जल प्रहरी की भूमिका निभानी होगी।

शनिवार को आईएमए ब्लड बैंक के सभागार में गंगा समग्र देहरादून की ओर से आयोजित जल संगोष्ठी को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित करते हुए डॉ. शैलेन्द्र ने यह बातें कहीं। उन्होंने कहा कि देहरादून में पिछले वर्ष आयी आपदा ने प्राकृतिक जलधाराओं के क्षेत्रों में हुए निर्माण की गंभीरता को सामने रखा। कई स्थानों पर नदी के प्रवाह क्षेत्र तक होटल, मकान और अन्य निर्माण हो गए हैं। प्राकृतिक धाराओं को बाधित कर उन्हें नाले और नालियों में बदलने की प्रवृत्ति पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि जल संरक्षण और वर्षाजल संचयन की योजनाएं केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वर्षाजल को जमीन में पहुंचाने की व्यवस्था के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। उन्होंने जल के विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि पीने योग्य पानी का इस्तेमाल मुख्य रूप से पेयजल के लिए हो, जबकि अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता वाले पानी का उपयोग स्नान, कपड़े धोने, सफाई और सिंचाई जैसे कार्यों में किया जा सकता है।

डॉ. शैलेन्द्र ने प्लास्टिक प्रदूषण को भी बड़ी चुनौती बताते हुए कहा कि तीर्थस्थलों और धार्मिक यात्राओं में प्लास्टिक बोतलों और अन्य कचरे की बढ़ती मात्रा चिंता का विषय है। केवल सफाई अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रदूषणकारी वस्तुओं को धार्मिक स्थलों तक पहुंचने से रोकना होगा। उन्होंने संतों, धर्माचार्यों और धार्मिक संस्थाओं से पर्यावरण संरक्षण के लिए समाज को जागरूक करने का आह्वान किया।

पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री राम सिंह कैड़ा ने बतौर मुख्य अतिथि कहा कि जल संरक्षण की शुरुआत घर और गांव से होनी चाहिए। जलस्रोतों की सुरक्षा, नदियों की स्वच्छता, बेहतर कचरा प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। नदी किनारे सफाई के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि कूड़ा, गंदा पानी और प्लास्टिक नदियों तक न पहुंचे।

उन्होंने कहा कि वर्षाजल संरक्षण, छोटे जलस्रोतों, नालों और जलागम क्षेत्रों को बचाने की दिशा में काम किया जा रहा है। जलस्रोत बचेंगे, तभी नदियां और पर्यावरण सुरक्षित रहेंगे।

उन्होंने रिस्पना, बिंदाल और सुसवा समेत अन्य जलस्रोतों को स्वच्छ रखने का संकल्प लेने का आह्वान किया। कैड़ा ने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में कई नौले और झरने सूखने के कगार पर हैं। प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण के लिए पौधारोपण के साथ उनके संरक्षण पर भी जोर दिया जा रहा है।

गंगा समग्र के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रामाशीष ने कहा कि गंगा संरक्षण केवल पर्यावरण या जल संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। बड़ी नदियां छोटी-छोटी धाराओं और सहायक नदियों से मिलकर बनती हैं, इसलिए गंगा को बचाने के लिए पूरे जलतंत्र का संरक्षण जरूरी है। गंगा को केवल हरिद्वार, ऋषिकेश, प्रयागराज या वाराणसी तक सीमित दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।

उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों में बदलाव, वर्षा के स्वरूप में परिवर्तन और भूजल के अत्यधिक दोहन से प्राकृतिक जलचक्र प्रभावित हो रहा है। ऐसे में छोटी धाराओं, जलस्रोतों और नदी के जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। उन्होंने नियोजित विकास और विकृत श्रद्धा को भी नदी संरक्षण के सामने चुनौती बताते हुए धार्मिक आस्था को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की जरूरत बताई।

रामाशीष ने कहा कि सरकार की ओर से गंगा की स्वच्छता और सीवेज प्रबंधन के लिए प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों को स्थायी सफलता तभी मिलेगी जब समाज भी सक्रिय भागीदारी करे। नदी किनारे अतिक्रमण रोकने, हरित क्षेत्र विकसित करने, प्लास्टिक के उचित निस्तारण तथा सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट को नदियों में जाने से रोकने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. डी.डी. चौधरी ने कहा कि मैदान हो या पहाड़, हर जगह मिलकर प्रकृति का संरक्षण करना होगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय