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शैव सन्यासी अखाड़ों की स्थापना को लेकर श्रीमहंत गोपाल गिरि का बड़ा दावा

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शैव सन्यासी अखाड़ों की स्थापना को लेकर श्रीमहंत गोपाल गिरि का बड़ा दावा


हरिद्वार, 17 अगस्त (हि.स.)। श्री शम्भू पंच दशनाम आवाहन अखाड़े के श्रीमहंत गोपाल गिरि महाराज ने शैव सन्यासी अखाड़ों के इतिहास को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन नागा सन्यासियों की परंपरा आज की नहीं, बल्कि करीब 1479 वर्ष पुरानी है।

सर्वप्रथम सन् 547 ईस्वी में श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन नागा सन्यासी ‘गोसाइयां’ की स्थापना हुई थी।

श्रीमहंत ने बताया कि इस परंपरा में 52 प्रकार के सन्यासी शामिल थे, जिन्हें अलग-अलग मढ़ियों के रूप में जाना जाता था। इसके लगभग 100 वर्ष बाद सन् 646 ईस्वी में श्री शंभू पंचायती अटल अखाड़े की स्थापना हुई। फिर सन् 789 ईस्वी में आवाहन और अटल की परंपरा से श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी अस्तित्व में आया।

आदि शंकराचार्य के संबंध में उन्होंने कहा कि उनका जन्म केरल के एर्नाकुलम जिले के कालड़ी ग्राम में पंडित शिवगुरु भट्ट और माता सुभद्रा के घर हुआ। आदि शंकराचार्य 32 वर्ष तक धरती पर रहे और सन् 821 ईस्वी में श्री केदारनाथ धाम में महासमाधि ली।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आदि शंकराचार्य ने न तो दश नाम परंपरा की स्थापना की और न ही किसी अखाड़े का गठन किया। उनके समय तक आवाहन, अटल और महानिर्वाणी तीन अखाड़े पहले से स्थापित थे। सन् 855 तक कोई अन्य अखाड़ा अस्तित्व में नहीं था।

श्रीमहंत के अनुसार सन् 856 में आवाहन परंपरा से आनंद अखाड़ा, सन् 904 में आनंद से निरंजनी, सन् 1136 में चारों मठों के नैष्ठिक ब्रह्मचारियों द्वारा श्री पंच अग्नि अखाड़ा और सन् 1156 में आवाहन और आनंद की परंपरा से जूना अखाड़े का गठन हुआ।

इस प्रकार ये चारों अखाड़े आदि शंकराचार्य के बाद बने।

उन्होंने कहा कि कुंभ स्नान की शैव सन्यासी परंपरा मूल रूप से आवाहन, अटल और महानिर्वाणी से जुड़ी है। अन्य अखाड़े बाद में शामिल हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि इतिहास को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। सनातन परंपरा से जुड़े लोगों तक तथ्य पहुंचाना जरूरी है।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला