मुर्गी पालन से आत्मनिर्भर बन रहीं पहाड़ की महिलाएं
पौड़ी गढ़वाल, 20 सितंबर (हि.स.)।पहाड़ में सीमित रोजगार के बीच स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं स्थानीय संसाधनों को आजीविका का जरिया बना रही हैं। पौड़ी विकासखंड के भैंसवाड़ा और पैडुल गांव में महिलाओं ने मुर्गी पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाकर न केवल परिवार की आय बढ़ाई है, बल्कि गांव में ही रोजगार का रास्ता तैयार किया है।
भैंसवाड़ा की जय मंगला देवी स्वयं सहायता समूह की पांच महिलाओं ने वर्ष 2021 में मुर्गी पालन शुरू किया था। वर्तमान में समूह के पास करीब 300 लेयर मुर्गियां हैं, जिनसे रोजाना लगभग 150 अंडों का उत्पादन हो रहा है। इसके अलावा करीब 500 ब्रॉयलर मुर्गियों का भी पालन किया जा रहा है। समूह स्थानीय बाजार के साथ श्रीनगर स्थित एसएसबी को भी मुर्गियों की आपूर्ति करता है।
प्रत्येक बुधवार को एसएसबी की ओर से करीब 80 से 100 किलोग्राम मुर्गियां खरीदी जाती हैं। समूह की महिलाओं के अनुसार इस गतिविधि से प्रतिमाह करीब 25 से 30 हजार रुपये की शुद्ध बचत हो रही है।
वहीं, पैडुल की नैना देवी स्वयं सहायता समूह की तीन महिलाओं ने करीब छह माह पहले ब्रॉयलर पालन शुरू किया। वर्तमान में समूह के पास करीब 1000 मुर्गियां हैं और रोजाना लगभग 150 किलोग्राम मुर्गियों की स्थानीय बाजार में आपूर्ति की जा रही है। इससे महिलाओं को प्रतिमाह करीब 17 से 20 हजार रुपये की शुद्ध बचत हो रही है।
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डॉ. विशाल शर्मा ने बताया कि पैडुल में ब्रॉयलर फार्म योजना के तहत समूह की तीन महिलाओं को 60 हजार रुपये का सहयोग दिया गया है। इसमें 45 हजार रुपये ब्रॉयलर मुर्गियों और 15 हजार रुपये मुर्गी बाड़े की मरम्मत के लिए दिए गए हैं। विभागीय सहयोग से महिलाओं को मुर्गी पालन को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिल रही है।
हिमोत्थान के ब्लॉक मिशन मैनेजर विजय बिष्ट ने बताया कि भैंसवाड़ा में हैचरी मशीन और ब्रूडिंग के लिए सोलर प्लांट स्थापित किया गया है। पैडुल में भी समूह की तीन महिलाओं को 20-20 हजार रुपये का सहयोग दिया गया है। उन्होंने बताया कि समूह एक दिन के चूजे खरीदता है, जिन्हें करीब 32 दिन में बिक्री के लिए तैयार किया जाता है। इस दौरान एक ब्रॉयलर का वजन लगभग दो किलोग्राम तक पहुंच जाता है।
भैंसवाड़ा और पैडुल की महिलाओं का यह प्रयास दिखाता है कि सामूहिक प्रयास, तकनीकी सहयोग और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर पहाड़ में गांव स्तर पर ही रोजगार के अवसर खड़े किए जा सकते हैं। मुर्गी पालन अब इन महिलाओं के लिए केवल पशुपालन नहीं, बल्कि परिवार की आय बढ़ाने और आत्मनिर्भर बनने का साधन बन रहा है।
हिन्दुस्थान समाचार / कर्ण सिंह

