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उत्तराखंड की लोकभाषाओं को एआई से जोड़ने की पहल, मुख्यमंत्री धामी ने पोर्टल का किया शुभारंभ

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उत्तराखंड की लोकभाषाओं को एआई से जोड़ने की पहल, मुख्यमंत्री धामी ने पोर्टल का किया शुभारंभ


-मुख्यमंत्री धामी की कुमाऊंनी आवाज से अभियान का शुभारंभ, बोले-लोकभाषाओं के संरक्षण के लिए तैयार होगा डिजिटल संग्रह

देहरादून, 22 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तराखंड की गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी लोकभाषाओं के संरक्षण और उन्हें आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए ‘भाषा एआई’ पहल के तहत वॉइस कलेक्शन पोर्टल शुरू किया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में इस पोर्टल का शुभारंभ किया। अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री की कुमाऊंनी भाषा में रिकॉर्ड की गई आवाज से हुई।

एआई स्ट्रैटेजिक इंजीनियरिंग (एआईएसई) फाउंडेशन की इस पहल का उद्देश्य तीनों लोकभाषाओं के शब्दों, उच्चारण और बोलने की शैलियों का डिजिटल संग्रह तैयार करना है, ताकि भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित तकनीक इन भाषाओं को समझने और इनमें संवाद करने में सक्षम हो सके।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि बोली-भाषाएं हमारी पहचान हैं और लोककला, संस्कृति तथा परंपराओं के संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग जरूरी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में क्षेत्रीय भाषाओं को भी इस तकनीक के अनुरूप विकसित करना होगा, जिससे देश-दुनिया में उत्तराखंड की भाषाई विरासत को पहचान मिल सके।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि दूरदराज के गांवों में रहने वाले लोग अपनी स्थानीय भाषा में सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकें और अपनी समस्याएं भी सरकार तक पहुंचा सकें। इसके लिए एआई का स्थानीय भाषाओं को सही ढंग से समझना जरूरी है। केवल शब्दों का संग्रह पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके सही उच्चारण और स्थानीय बोलने की शैलियों को भी डिजिटल मंच पर दर्ज करना होगा।

धामी ने कहा कि उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही शब्द का उच्चारण अलग-अलग तरीके से किया जाता है। पोर्टल पर स्थानीय लोगों की आवाज और भाषाई जानकारी जुटाने से एआई को इस विविधता को समझने में मदद मिलेगी। उन्होंने विश्वास जताया कि यह पहल आने वाली पीढ़ियों को अपनी लोकभाषाओं, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने में भी उपयोगी साबित होगी।

इस अवसर पर पद्मश्री लोकगायक प्रीतम भरतवाण ने कहा कि उत्तराखंड की लोकभाषाओं में लोकजीवन, लोकगीत, जागर और सांस्कृतिक परंपराओं की समृद्ध विरासत समाहित है। उन्होंने बताया कि जागर अकादमी इस पहल में स्थानीय भाषाओं के सही उच्चारण और उनकी मौलिकता को बनाए रखने में सहयोग करेगी।

एआईएसई फाउंडेशन के संस्थापक सचिदानंद सेमवाल ने बताया कि ‘भाषा एआई’ पहल के तहत गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी के शब्दों एवं आवाजों का संग्रह तैयार किया जा रहा है। इसका लक्ष्य भविष्य में एआई आधारित तकनीक के माध्यम से इन भाषाओं में संवाद को संभव बनाना है।

कार्यक्रम में शक्ति प्रसाद भट्ट, गजेंद्र नौटियाल, अनिरुद्ध रैथवान, निधि सेमवाल, अनिल गोदियाल, डॉ. जे.के. पांडे और देव रतूड़ी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय