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भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक भूमि बद्रीकाश्रम मे तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का शुभारंभ

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भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक भूमि बद्रीकाश्रम मे तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का शुभारंभ


बद्रीनाथ, 14 मई (हि.स.)। भारतीय ज्ञान परम्परा की ऐतिहासिक भूमि बद्रिकाश्रम धाम विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का शुभारम्भ नारायण स्वामी आश्रम बद्रीनाथ में हुआ।

यह सम्मेलन उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार, सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय रघुनाथ कीर्ति परिसर देवप्रयाग तथा अग्निमन्दिर के संयुक्त तत्त्वावधान में योजित किया जा रहा है जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से 350 से अधिक प्रतिभागी, शोध छात्र, प्रोफेसर्स भाग ले रहे हैं।

कार्यक्रम के मुख्यातिथि स्वामी बालकनाथ ने कहा कि बदरी धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सनातन भारतीय ज्ञान परम्परा का जीवंत केंद्र है। उन्होंने कहा कि हिमालय की यह पुण्यभूमि सदियों से ऋषियों, योगियों एवं तपस्वियों की साधना का केंद्र रही है, जहाँ से वेद, उपनिषद, योग एवं अध्यात्म की दिव्य चेतना संपूर्ण विश्व में प्रवाहित हुई। उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ धाम का प्रत्येक कण भारतीय संस्कृति, तप, त्याग व आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत है। यह वही भूमि है जहाँ नर-नारायण ने तप किया, जहाँ वेदव्यास ने महाभारत की रचना की तथा जहाँ आदिगुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का महान कार्य किया।

संगोष्ठी में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग परिसर के निदेशक प्रोफेसर पी वी सुब्रह्मण्यम ने बद्रीनाथ धाम की अलौकिक महिमा एवं रहस्यमयी परम्पराओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बद्रिकाश्रम धाम केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक आध्यात्मिक सभ्यता एवं ज्ञान-विज्ञान का प्राचीन स्रोत रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार के कुलपति प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय ने इस तथ्य का उल्लेख करते हुए कहा कि हिमालय की गोद में स्थित यह धाम सदियों से आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है, बद्रीनाथ धाम से जुड़ी अनेक पौराणिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ आज भी ऋषि परम्परा की सूक्ष्म चेतना विद्यमान है।

होटल एशोसिएशन के अध्यक्ष राजेश मेहता ने कहा कि अलकनंदा तट, तप्तकुण्ड एवं नारद शिला जैसे पवित्र स्थल भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य धरोहर है। उद्घाटन सत्र में भारतीय शिक्षा पद्धति, गुरुकुल परम्परा, योग-विज्ञान, पर्यावरण चेतना व सनातन जीवन मूल्यों पर भी गंभीर चर्चा हुई।

कार्यक्रम के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार, मंगलाचरण एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने वातावरण को भक्तिमय व आध्यात्मिक बना दिया। इस अवसर पर हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ दिनेश पांडेय की पुस्तक वाक शुद्धि का विमोचन उपस्थित विद्वानों के कर कमलों से हुआ कार्यक्रम में मुख्य संयोजक डॉ मनोज विश्नोई ने रूपरेखा प्रस्तुत की। संचालन डॉ. प्रदीप सेमवाल ने किया।

हिन्दुस्थान समाचार / प्रकाश कपरुवाण