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संतान के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिए महिलाओं ने रखा निर्जला 'जीवित्पुत्रिका' व्रत

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संतान के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिए महिलाओं ने रखा निर्जला 'जीवित्पुत्रिका' व्रत


- लक्ष्मीकुंड पर सोरहिया मेले का समापन,महालक्ष्मी के दरबार में महिलाओं की उमड़ी भीड़,कुंडों और तालाबों पर भगवान जीमूतवाहन की कथा भी सुनी

वाराणसी,03 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर शनिवार को महिलाओं ने अपनी संतानों के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना से निर्जला जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत रखा। व्रत को लेकर महिलाओं में खासा उत्साह देखने को मिला। व्रती महिलाओं ने भोर में सरगही ग्रहण करने के बाद निर्जला उपवास शुरू किया। रविवार सुबह उदित सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाएगा।

जिउतिया व्रत के तहत दोपहर से ही शहर के विभिन्न कुंडों, तालाबों और सरोवरों के किनारे महिलाओं के समूह जुटने लगे। महिलाओं ने भगवान जीमूतवाहन की कथा सुनी और विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। शाम को अस्त होते सूर्य को दीप दिखाकर सरोवरों में दीपदान किया जाएगा। इसके बाद व्रती महिलाएं अपने घरों को लौटेंगी।

काशी में जिउतिया व्रत के दौरान मां लक्ष्मी की विशेष पूजा का भी विधान है। लक्सा स्थित लक्ष्मीकुंड के महालक्ष्मी मंदिर में शनिवार को बड़ी संख्या में व्रती महिलाओं ने पहुंचकर दर्शन-पूजन किया। महिलाओं की भारी भीड़ के कारण मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में मेले जैसा दृश्य रहा। इसी के साथ लक्ष्मीकुंड पर 16 दिनों से चल रहे मां लक्ष्मी के विशेष पूजन-अर्चन का भी समापन हो गया। इस अवसर पर आयोजित सोरहिया मेले में श्रद्धालुओं ने 16 गांठ का धागा, 16 प्रकार के फल, 16 प्रकार की सब्जियां और 16 श्रृंगार सामग्री अर्पित की। इस दौरान 16 बार जप-कीर्तन करने की भी परंपरा निभाई गई।

अंतिम दिन जिउतिया व्रत के चलते लक्ष्मीकुंड स्थित मंदिर में भोर से ही व्रती महिलाओं की भीड़ जुटने लगी। महिलाओं ने गंगा स्नान के बाद लक्ष्मीकुंड पहुंचकर मां लक्ष्मी का दर्शन-पूजन किया। कुंड परिसर में गन्ने से मंडप बनाए गए, जिनके नीचे जिउतिया माता और लक्ष्मी माता के विग्रह स्थापित किए गए। उनके समक्ष जल से भरे कलश पर दीप प्रज्ज्वलित कर पूजा की गई।

लक्सा के अलावा शहर के अन्य प्रमुख कुंडों और तालाबों के किनारे भी बड़ी संख्या में व्रती महिलाएं पहुंचीं। मुख्य पूजा क्षेत्र में भीड़ को देखते हुए श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए रथयात्रा, गुरुबाग और गिरजाघर मार्ग से लक्सा की ओर वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित किया गया था। सुबह से शाम तक लक्ष्मीकुंड और आसपास का इलाका श्रद्धालुओं की भीड़ से गुलजार रहा।

दूर-दराज के क्षेत्रों से भी महिलाएं परिवार के साथ लक्ष्मीकुंड पहुंचीं। पूजा के लिए बनाए गए मंडपों में कथा और पूजन का सिलसिला चलता रहा। आसपास के बाजारों और गलियों में भी दिनभर चहल-पहल बनी रही। जिउतिया माता के जयकारों से पूरा क्षेत्र भक्तिमय नजर आया।

महाभारत काल से जुड़ी है जिउतिया व्रत की मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार जिउतिया व्रत का संबंध महाभारत काल से माना जाता है। कथा के मुताबिक, द्रोणाचार्य के वध के बाद उनके पुत्र अश्वत्थामा ने क्रोध में ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। इससे अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहा शिशु नष्ट हो गया था। मान्यता है कि उत्तरा ने संतान की रक्षा और जीवन की कामना से यह व्रत किया। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने गर्भस्थ शिशु को पुनर्जीवन प्रदान किया। तभी से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि की कामना से जीवित्पुत्रिका व्रत करती आ रही हैं।------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी