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बाल प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एम्स गोरखपुर का नवाचार, सस्ती स्वदेशी तकनीक को मिली वैश्विक स्वीकृति

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बाल प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एम्स गोरखपुर का नवाचार, सस्ती स्वदेशी तकनीक को मिली वैश्विक स्वीकृति


साधारण सुई से तैयार किया प्रभावी इम्प्लांटर, कम संसाधनों वाले चिकित्सा संस्थानों को मिलेगा लाभ

गोरखपुर, 15 जुलाई (हि.स.)। चिकित्सा विज्ञान में शोध और स्वदेशी तकनीक के विकास की दिशा में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, गोरखपुर ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। संस्थान के त्वचा एवं यौन रोग विभाग के चिकित्सकों ने बाल प्रत्यारोपण के लिए ऐसी किफायती विधि विकसित की है, जिसमें महंगे उपकरणों की आवश्यकता काफी कम हो सकती है। इस वैज्ञानिक प्रयोग से संबंधित शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित ‘जर्नल ऑफ क्यूटेनियस एंड एस्थेटिक सर्जरी’ में स्थान मिला है।

नई पद्धति की परिकल्पना विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) सुनील कुमार गुप्ता ने की है। इसके अंतर्गत चिकित्सा में सामान्यतः प्रयोग होने वाली 18जी अथवा 20जी सुई में आवश्यक बदलाव कर उसे बालों के ग्राफ्ट प्रत्यारोपण के लिए उपयोगी उपकरण का रूप दिया गया है।

इस विधि में बाल लगाने के लिए त्वचा में स्थान तैयार करने और ग्राफ्ट स्थापित करने की प्रक्रिया एक ही चरण में पूरी की जा सकती है। इससे प्रत्यारोपित किए जाने वाले ग्राफ्ट को शरीर से बाहर कम समय तक रखना पड़ता है। परिणामस्वरूप ग्राफ्ट की सुरक्षा और गुणवत्ता बनाए रखने में सहायता मिल सकती है। साथ ही विशेष और महंगे इम्प्लांटर पर निर्भरता भी घटेगी।

छोटे हेयर ट्रांसप्लांट में कारगर हो सकती है तकनीक

चिकित्सकों के अनुसार यह पद्धति सीमित क्षेत्र में किए जाने वाले हेयर ट्रांसप्लांट, प्राकृतिक हेयरलाइन के पुनर्निर्माण और सफेद दाग यानी विटिलिगो की शल्य चिकित्सा में विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है। कम खर्च और आसानी से उपलब्ध सामग्री पर आधारित होने के कारण छोटे अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और सीमित संसाधनों वाले स्वास्थ्य केंद्रों में भी इसे अपनाने की संभावनाएं हैं। इससे उन्नत त्वचा एवं बाल चिकित्सा सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुंचाने में सहायता मिल सकती है।

चिकित्सकों की टीम ने मिलकर पूरा किया शोध

अध्ययन की मूल अवधारणा, तकनीकी रूपरेखा और शोध की डिजाइन प्रो. (डॉ.) सुनील कुमार गुप्ता ने तैयार की। शोध को व्यावहारिक रूप देने और शोध-पत्र लिखने में डॉ. कृतिका गुप्ता की प्रमुख भूमिका रही।

डॉ. कौशिकी सुमन ने शोध-पांडुलिपि के संपादन में योगदान दिया, जबकि डॉ. शिवांगी राणा ने अध्ययन की समीक्षा और प्रूफरीडिंग का दायित्व संभाला। टीम के संयुक्त प्रयास से विकसित इस तकनीक को अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा जगत के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

स्वदेशी चिकित्सा उपकरणों के विकास को मिलेगा प्रोत्साहन

प्रो. (डॉ.) सुनील कुमार गुप्ता के अनुसार एम्स गोरखपुर रोगियों को बेहतर उपचार देने के साथ-साथ ऐसी चिकित्सा पद्धतियों और उपकरणों के विकास पर भी कार्य कर रहा है, जो सुरक्षित, व्यावहारिक और आर्थिक रूप से सुलभ हों।

उन्होंने कहा कि देश में विकसित यह तकनीक ‘मेक इन इंडिया’ की भावना के अनुरूप है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं में स्वदेशी नवाचार को प्रोत्साहन मिलने के साथ ही उपचार की लागत कम करने की दिशा में भी सहायता मिलेगी।

विभाग का प्रयास है कि अनुसंधान के माध्यम से ऐसी तकनीकें विकसित की जाएं, जिन्हें देश के विभिन्न सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थान सरलता से अपना सकें। भविष्य में भी रोगियों को आधुनिक, सुरक्षित और किफायती उपचार उपलब्ध कराने के लिए शोध कार्य जारी रखे जाएंगे।

त्वचा, बाल और सौंदर्य चिकित्सा की आधुनिक सेवाएं उपलब्ध

एम्स गोरखपुर का त्वचा एवं यौन रोग विभाग डर्माटोसर्जरी और एस्थेटिक डर्मेटोलॉजी से जुड़ी कई उन्नत चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है।

विभाग में एफयूई पद्धति से हेयर ट्रांसप्लांट, पीआरपी थेरेपी, विटिलिगो सर्जरी, मुंहासों और उनके दागों का उपचार, केमिकल पील,माइक्रोनिडलिंग, रेडियोफ्रीक्वेंसी तथा इलेक्ट्रोसर्जरी जैसी प्रक्रियाएं की जा रही हैं।

इसके अतिरिक्त त्वचा, बाल और नाखून से संबंधित विभिन्न जटिल रोगों के उपचार के लिए भी आधुनिक डर्माटोसर्जिकल तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार एम्स गोरखपुर का यह नवाचार कम लागत में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

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हिन्दुस्थान समाचार / प्रिंस पाण्डेय