नव संवत्सर के नक्षत्र मंडल में वर्ष के राजा के आसीन होने पर शनि संसद नवग्रह मंदिर में श्रृंगार
—वैशाख की अमावस्या को राजा और मंत्री के राज्याभिषेक का आयोजन
वाराणसी, 18 अप्रैल (हि.स.)। नव संवत्सर 2083 के अवसर पर काशी में स्थित श्री शनि संसद नवग्रह मंदिर में शनिवार को भव्य श्रृंगार और पूजन का आयोजन किया गया। नक्षत्र मंडल में इस वर्ष देवगुरु बृहस्पति देव को राजा तथा मंगल देव को मंत्री पद मिलने की मान्यता के साथ विशेष अनुष्ठान संपन्न हुआ।
मीरघाट स्थित त्रिपुरा भैरवी क्षेत्र की रानी भवानी गली में आयोजित इस कार्यक्रम में विधि-विधान से हवन-पूजन और श्रृंगार के बाद भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। मंदिर से जुड़े गुलशन कपूर के अनुसार, विक्रम संवत के प्रत्येक वर्ष नवग्रह मंडल द्वारा सृष्टि के संचालन हेतु प्रतीकात्मक मंत्री परिषद का गठन होता है, जिसका उल्लेख सनातन धर्मग्रंथों और पुराणों में मिलता है। इसी परंपरा के तहत हर वर्ष यहां राजा और मंत्री का राज्याभिषेक किया जाता है।
उन्होंने बताया कि आगामी वैशाख अमावस्या पर राजा और मंत्री के औपचारिक राज्याभिषेक का आयोजन भी किया जाएगा। गुलशन कपूर ने शनि देव से जुड़ी पौराणिक कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि सूर्यदेव और माता छाया के पुत्र के रूप में जन्मे शनिदेव ने काशी आकर काशी विश्वनाथ मंदिर में तपस्या की थी। उनकी कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें कर्मफल दाता के रूप में स्थापित किया और नवग्रह मंडल में स्थान प्रदान किया।
मंदिर की विशेषता बताते हुए उन्होंने कहा कि यहां शनिदेव की प्राचीन प्रतिमा गजवाहन (हाथी) पर सवार स्वरूप में स्थापित है, जो काशी में अद्वितीय मानी जाती है। मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने से शनि से संबंधित पीड़ाओं से राहत मिलती है और वैभव-लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। उन्होंने कहा कि शनि की साढ़ेसाती, अढ़ैया या महादशा जीवन में आत्ममंथन का समय होती है, न कि भय का। यदि व्यक्ति सदाचार और धर्म के मार्ग पर चलता है, तो शनिदेव की कृपा से उसे जीवन में उन्नति प्राप्त होती है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

