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युवा अपने अस्तित्व, अपने राष्ट्र और अपने उत्तरदायित्व को पहचानें: आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण

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युवा अपने अस्तित्व, अपने राष्ट्र और अपने उत्तरदायित्व को पहचानें: आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण


—‘उत्तिष्ठ भारत : संवाद से समझ की ओर’ कार्यक्रम में बोले अयोध्या के संत

वाराणसी, 27 अप्रैल (हि.स.)। अयोध्या स्थित हनुमत निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने साेमवार काे कहा कि शत्रु विजयी नहीं होता, दुर्बलताएँ परास्त होती हैं। व्यक्ति-निर्माण और राष्ट्र निर्माण के बीच जो फाँक उत्पन्न हुई है, वही आज की सबसे बड़ी चुनौती है। जो विकसित हुआ, उसने विकास को वैयक्तिक माना, राष्ट्रीय नहीं, परिणामस्वरूप भारतीय तो विकसित हुए, पर भारत के विकास पर संदेह बना रहा।

आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण सेवाज्ञ संस्थानम् काशी एवं शिक्षा संकाय, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘उत्तिष्ठ भारत : संवाद से समझ की ओर’ कार्यक्रम को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने राष्ट्रबोध का मर्म समझाते हुए कहा कि जीवन उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि, विपरिणाम, अपक्षय और नाश की प्रक्रिया है, और इन सबके पार जाना ही वास्तविक स्वाधीनता है। स्वाधीनता का अर्थ केवल झंडा फहराना नहीं, बल्कि स्वत्व-बोध और स्वत्व के साथ सार्थक जीवन जीना है। उन्होंने स्वामी स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि विश्व में सम्मान प्राप्त करने के बाद भी वे भारत की मिट्टी में लौटने को धन्य मानते थे। यही राष्ट्रबोध है।

उन्होंने कहा कि आज की स्थिति स्वतंत्रता नहीं, बल्कि निरंकुशता है। केवल अभिव्यक्ति की उच्छृंखलता स्वतंत्रता नहीं होती। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने अस्तित्व, अपने राष्ट्र और अपने उत्तरदायित्व को पहचानें। उन्होंने कहा कि उत्तरदायित्व का अर्थ है—जो हमने लिया है, उसे लौटाना। जिस देश, राष्ट्र, माता-पिता, समाज और प्रकृति से हमें जीवन मिला है, उसके प्रति ऋणबोध ही राष्ट्र निर्माण का आधार है। कार्यक्रम में युवा साहित्यकार व्योमेश शुक्ल ने ‘जीवन, समाज एवं उत्तरदायित्व’ विषय पर मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, धूमिल और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के संदर्भों के माध्यम से समाज की वैचारिक दिशा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्थाएँ केवल संरचना नहीं, बल्कि चेतना का केंद्र होती हैं।

शिक्षा संकाय की डीन प्रो. अंजली वाजपेयी ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि राष्ट्र निर्माण केवल बड़े मंचों पर दिए गए भाषणों से नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के छोटे-छोटे उत्तरदायित्वों के निर्वहन से होता है। उन्होंने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि जो भी जिस क्षेत्र में है, वहीं से अपने समाज और राष्ट्र के लिए सार्थक योगदान दे सकता है। कार्यक्रम का संचालन प्रज्ञा दुबे ने किया। इसके पहले कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण एवं दीप प्रज्वलन से हुआ। कार्यक्रम में सारस्वत अतिथि डॉ. वागीश शुक्ल, डॉ. हरेंद्र कुमार राय, शिवम् पाण्डेय आदि की मौजूदगी रही।-----------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी