‘सावन उत्सव 2026’ में लोकगीतों और भारतीय परंपराओं की मनोहारी प्रस्तुति
- लोकगीतों में जीवंत है संस्कृति, संस्कार और लोकजीवन की आत्मा : आम्रपाली त्रिवेदी
वाराणसी, 02 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन केन्द्र की ओर से बुधवार को मुख्य भवन सभागार में ‘सावन उत्सव 2026’ का आयोजन किया गया। कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित उत्सव में लोकगीतों, सावनी गीतों, नृत्य और विभिन्न पारंपरिक गतिविधियों के माध्यम से भारतीय लोकसंस्कृति, परंपरा और नारी शक्ति की मनोहारी झलक देखने को मिली।
कार्यक्रम में सावन की हरियाली और भारतीय लोकजीवन की रंगीन छटा को विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से साकार किया गया। कुलगीत, गणेश नृत्य-वंदना, शिव-पार्वती, राधा-कृष्ण नाट्य-नृत्य और तिब्बती नृत्य सहित अनेक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। प्रस्तुतियों में भारतीय संस्कृति की विविधता के साथ नारी भावनाओं और लोकपरंपराओं का सुंदर समन्वय देखने को मिला।
इस अवसर पर कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि सावन महोत्सव सनातन संस्कृति, प्रकृति-प्रेम और लोकपरंपराओं का सुंदर संगम है। भारतीय परंपरा में नारी केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि संस्कृति और संस्कारों की संवाहिका भी रही है। सावन के लोकगीतों, तीज, झूला और मंगलाचरण के माध्यम से मातृशक्ति ने पीढ़ियों से लोकजीवन की आत्मीयता और सांस्कृतिक चेतना को जीवंत रखा है।
उन्होंने कहा कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ भारतीय परंपरा में नारी सम्मान के महत्व को रेखांकित करता है। सावन उत्सव में महिलाओं की सक्रिय सहभागिता नारी सम्मान और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक है।
लोकगीत संस्कृति और संस्कारों का महत्वपूर्ण हिस्सा
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि बसन्ता महाविद्यालय, राजघाट की गृहविज्ञान एवं इंटीरियर डिजाइनर प्रो. आम्रपाली त्रिवेदी ने कहा कि लोकगीत हमारी संस्कृति और संस्कारों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। भारतीय संस्कृति और जीवन-मूल्यों को अक्षुण्ण बनाए रखने में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। महिलाओं ने अपने गीतों, पर्वों और परंपराओं के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि लोकगीतों में सामाजिक रीति-रिवाज, पारिवारिक भावनाएं, लोकजीवन और सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित है। बदलते समय में भी इन परंपराओं को जीवंत बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।
लोकसंगीत में निहित है सांस्कृतिक धरोहर
राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, चौकाघाट की पूर्व प्राचार्या प्रो. नीलम गुप्ता ने लोकसंगीत के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारी संस्कृति और धरोहर का बड़ा हिस्सा लोकगीतों में संरक्षित है। महिलाओं ने लोकगीतों के माध्यम से अपने सुख-दुःख, अनुभवों, भावनाओं और परंपराओं को अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने कहा कि लोकगीत हमें अपनी जड़ों से जोड़ने के साथ हमारी सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करते हैं।
लोकगीत, फैशन शो और मेहंदी प्रतियोगिताओं ने बढ़ाया उत्साह
उत्सव के दौरान लोकगीत, फैशन शो, क्विज, मेहंदी, चूड़ी एवं सुहाग से संबंधित विभिन्न प्रतियोगिताओं और गतिविधियों का आयोजन किया गया। महिलाओं ने उत्साहपूर्वक इनमें प्रतिभाग किया। सावन के पारंपरिक रंग, गीत-संगीत और उल्लास से पूरा परिसर उत्सवमय नजर आया।
महिला अध्ययन केन्द्र की पहल की सराहना
महिला अध्ययन केन्द्र की निदेशक एवं संयोजिका प्रो. विधु द्विवेदी ने कहा कि ‘सावन उत्सव’ के माध्यम से महिलाओं की रचनात्मक प्रतिभा, लोकसंस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को मंच प्रदान करने का प्रयास किया गया है। ऐसे आयोजन सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ महिलाओं को अपनी प्रतिभा और भावनाओं की अभिव्यक्ति का अवसर भी देते हैं।
इससे पहले कार्यक्रम स्थल को सावन की हरियाली, पुष्पों, झूलों और पारंपरिक सज्जा से आकर्षक रूप दिया गया। कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने सावन से संबंधित गीत, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। विभिन्न गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. कंचन मिश्रा ने किया। आयोजन में विश्वविद्यालय के कुलसचिव राकेश कुमार, चीफ प्रॉक्टर प्रो. जितेन्द्र कुमार, प्रो. हीरक कान्ति चक्रवर्ती, डॉ. विशाखा शुक्ला, डॉ. रविशंकर पाण्डेय, प्रो. शशिरानी मिश्रा और डॉ. रानी द्विवेदी सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, अधिकारी एवं अन्य प्रतिभागी उत्साहपूर्वक उपस्थित रहे।---------------
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

