भारतीय भाषाओं में ज्ञान-सृजन के नए युग का सूत्रपात : प्रो. बिहारी लाल शर्मा
—देश के शीर्ष कुलपतियों का वाराणसी में महामंथन, भारतीय भाषा पुस्तक लेखन कार्यक्रम पर हुई व्यापक चर्चा
वाराणसी, 02 जून (हि.स.)। शिक्षा मंत्रालय की महत्त्वाकांक्षी पहल भारतीय भाषा पुस्तक लेखन कार्यक्रम के उत्तर प्रदेश में प्रभावी एवं उत्कृष्ट क्रियान्वयन को लेकर मंगलवार को सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में उच्चस्तरीय उपवेशन कार्यक्रम आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय के योग साधना सभागार में आयोजित इस बैठक में भारतीय भाषाओं में उच्चस्तरीय ज्ञान-साहित्य के सृजन, भारतीय ज्ञान-परम्परा के पुनर्स्थापन तथा भाषायी आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ बनाने के विभिन्न आयामों पर गहन मंथन किया गया।
कार्यक्रम में भारतीय भाषा समिति, नई दिल्ली के सदस्य डॉ. चन्दन कुमार ने भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्य-पुस्तकों के निर्माण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि ज्ञान के भारतीयकरण तथा मातृभाषा-आधारित शिक्षा व्यवस्था को सशक्त बनाने में यह योजना मील का पत्थर सिद्ध होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा को अधिक समावेशी और विद्यार्थियों के लिए सहज बनाने के लिए भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट शैक्षणिक सामग्री का विकास अत्यंत आवश्यक है।
इस अवसर पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, शिक्षाविद एवं शिक्षण संस्थानों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार साझा किए। प्रमुख वक्ताओं में प्रो. आर. एस. दूबे (पूर्व कुलपति, गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय एवं वर्तमान कुलाधिपति, नीपा, नई दिल्ली), प्रो. आर. के. मित्तल (कुलपति, बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ), प्रो. संजीव शर्मा (कुलपति, महाराजा सुहेलदेव विश्वविद्यालय, आजमगढ़), प्रो. ए. के. त्यागी (कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी) तथा प्रो. राजकुमार (पूर्व कुलपति, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़) शामिल रहे।
कार्यक्रम में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि भारतीय भाषाएँ केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना, बौद्धिक विरासत और ज्ञान-परम्परा की संवाहक हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में पाठ्य-पुस्तक निर्माण, शोध-संवर्धन और ज्ञान-विस्तार की दिशा में यह पहल एक नई शैक्षिक क्रान्ति की आधारशिला सिद्ध होगी। प्रो. शर्मा ने जोर देकर कहा कि भारतीय भाषाओं को ज्ञान-विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करना समय की महती आवश्यकता है। इससे न केवल विद्यार्थियों की विषय-वस्तु तक पहुँच आसान होगी, बल्कि भारत की ज्ञान-परम्परा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान भी मिलेगी। विमर्श के दौरान विशेषज्ञों ने भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण अकादमिक साहित्य के निर्माण, शोध कार्यों को स्थानीय भाषाओं से जोड़ने तथा शिक्षा को अधिक जनोन्मुख और समावेशी बनाने के संबंध में कई दूरदर्शी सुझाव प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण और दूरगामी पहल बताया। कार्यक्रम का संयोजन प्रो. शैलेश कुमार मिश्र ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. उदयन मिश्र ने प्रस्तुत किया।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

