मनुस्मृति के मूल स्वरूप में नहीं होगा बदलाव : शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद
—काशी विद्वत परिषद की बैठक में पंचांगों की विसंगतियां दूर करने पर भी जोर, विद्वानों की राष्ट्रीय स्तर पर सभा बुलाने का निर्णय
वाराणसी, 23 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में वाराणसी के केदारघाट स्थित श्रीविद्या मठ में शुक्रवार को श्री काशी विद्वत परिषद (न्यास) की आवश्यक बैठक ज्योतिषपीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के सानिध्य में संपन्न हुई। बैठक में मनुस्मृति के मूल स्वरूप, स्मृतियों में संशोधन के अधिकार, पंचांगों में व्याप्त विसंगतियों तथा धार्मिक पर्वों की तिथियों में एकरूपता स्थापित करने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।
बैठक में मनुस्मृति में संशोधन को लेकर चल रही चर्चाओं से समाज में उत्पन्न भ्रम और विवाद की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई। निर्णय लिया गया कि इस विषय पर देश के विशिष्ट विद्वानों की बैठक बुलाई जाएगी। इसके बाद व्यापक स्तर पर एक सभा आयोजित की जाएगी, जिसमें देश-विदेश में उपलब्ध मनुस्मृति की पांडुलिपियों और विभिन्न प्रकाशनों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा। इसमें मूल प्रतियों और उनके विभिन्न संस्करणों की भाषा एवं पाठ में आए अंतर की पड़ताल की जाएगी।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि मनुस्मृति के वास्तविक स्वरूप को किसी भी स्थिति में बदला नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि मनुस्मृति के अपरिवर्तनीय स्वरूप को लेकर देश के विद्वानों को आमंत्रित कर व्यापक विचार-विमर्श किया जाएगा और इस संबंध में ठोस निर्णय लिया जाएगा।
बैठक में यह मुद्दा भी उठाया गया कि क्या स्मृतियों में संशोधन करने का अधिकार किसी को है। विद्वानों ने आशंका जताई कि स्मृतियों में संशोधन की परंपरा को लेकर उठने वाली चर्चाएं भविष्य में वेदों में संशोधन जैसे प्रश्नों को भी जन्म दे सकती हैं, जिससे समाज में भ्रम की स्थिति और बढ़ सकती है।
——पंचांगों में एकरूपता पर जोर
बैठक में पंचांग निर्माण से जुड़ी विसंगतियों और विभिन्न पंचांगों में तिथियों के अंतर के कारण एक ही पर्व अलग-अलग दिनों में मनाए जाने की समस्या पर भी चर्चा हुई। शंकराचार्य ने कहा कि पंचांगों के मतभेद दूर करने और त्योहारों की तिथियों में एकरूपता स्थापित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे, ताकि समाज में व्याप्त भ्रम को दूर किया जा सके।
आचार्य सुधाकर मिश्र ने प्रस्ताव रखा कि देश के विभिन्न संग्रहालयों और संस्थानों में संरक्षित प्रमाणित पांडुलिपियों को अध्ययन के लिए मंगाया जाए। इनके तुलनात्मक अध्ययन और विद्वानों के मंथन से मनुस्मृति के मूल पाठ को लेकर उठने वाले विवादों और भ्रांतियों को दूर करने में सहायता मिलेगी। साथ ही, भविष्य में इस विषय पर किसी भी प्रकार का दावा प्रमाणों के आधार पर परखा जा सकेगा।
——त्रैमासिक पत्रिका का होगा प्रकाशन
बैठक में योगेश ब्रह्मचारी ने परिषद की ओर से त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित करने का प्रस्ताव रखा। पत्रिका का नाम ‘विद्वन् मनोरंजिनी’ रखने का सुझाव दिया गया। इसके माध्यम से समय-समय पर सामने आने वाले विभिन्न विषयों पर विद्वानों के विचार और उनके समाधान प्रकाशित किए जाएंगे।
बैठक में न्यास के अध्यक्ष डॉ. परमेश्वर दत्त शुक्ल, उपाध्यक्ष कमलाकांत त्रिपाठी, महामंत्री आचार्य शत्रुघ्न त्रिपाठी, आचार्य सुधाकर मिश्र, प्रो. श्रीकृष्ण त्रिपाठी, उमापति उपाध्याय, पं. महेंद्र पांडेय सहित अन्य विद्वान उपस्थित रहे।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

