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वाराणसी में तीन जगद्गुरुओं समेत संतों ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से की मुलाकात

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वाराणसी में तीन जगद्गुरुओं समेत संतों ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से की मुलाकात


—धर्म और गौ-रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्षों की सराहना, संतों ने हर कदम पर साथ देने का दिया भरोसा

वाराणसी, 18 अक्टूबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश में वाराणसी शंकराचार्यघाट स्थित श्रीविद्यामठ में रविवार को तीन जगद्गुरुओं समेत विभिन्न संतों ने ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात की। इस दौरान आध्यात्मिक विषयों पर विमर्श हुआ और संतों ने उनसे मार्गदर्शन प्राप्त किया। संतों ने धर्म एवं गौ-रक्षा के लिए शंकराचार्य द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए हर परिस्थिति में उनके साथ खड़े रहने का संकल्प व्यक्त किया।

श्रीविद्यामठ में आयोजित इस मुलाकात में जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री श्री 1008 स्वामी योगेश्वराचार्य, पीठाधीश्वर, अतुलेश्वर धाम, इंद्रप्रस्थ; जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री श्री 1008 स्वामी अवधेशानंद, पीठाधीश्वर, ओम शांति धाम, नई दिल्ली; जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री श्री 1008 स्वामी सारंगधराचार्य, पीठाधीश्वर, सारंग मंदिर, प्रयाग, परम वैष्णव स्वामी चंद्रप्रकाशाचार्य, वैष्णव आश्रम, मुंबई; धर्माचार्य ओम प्रकाश पांडेय तथा अनिरुद्ध रामानुज दास पंडित दिनेश शर्मा सहित अनेक संत उपस्थित रहे।

इस अवसर पर संतों ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अंगवस्त्र, भगवान श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद तथा डॉ. अंकिता द्वारा रचित पुस्तक सनातन शाश्वत भेंट कर सम्मानित किया। साथ ही श्रीविद्यामठ में उपस्थित सैकड़ों बटुकों, विद्वानों एवं संतों को भी अंगवस्त्र और भगवान श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद वितरित किया गया।

धर्म और गौ-रक्षा के संघर्षों की सराहना

संतों ने एक स्वर में शंकराचार्य के धर्म एवं गौ-रक्षा के लिए किए जा रहे संघर्षों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और गौमाता की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने सत्ता और अधर्म के विरुद्ध परिणामों की परवाह किए बिना अपनी आवाज बुलंद की है।

संतों ने कहा कि शंकराचार्य ने सनातन धर्म के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करने और धर्म की रक्षा के लिए जो अलख जगाई है, वह वंदनीय है। संत समाज उनके साथ खड़ा है और उनके आह्वान पर धर्म एवं गौ-रक्षा के लिए किसी भी प्रकार का बलिदान देने को तत्पर है।

‘पद की शोभा बढ़ाने नहीं, धर्म की रक्षा के लिए बने हैं शंकराचार्य’

संतों को संबोधित करते हुए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि उन्होंने पद की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए शंकराचार्य का दायित्व स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि यदि गौमाता की हत्या होती रहे, धर्म की हानि होती रहे और वे मौन रहें, तो उनके इस पद पर रहने का औचित्य ही क्या है?

उन्होंने कहा कि गौमाता और धर्म की रक्षा के लिए वे हरसंभव प्रयास करते रहेंगे तथा इसके लिए जो भी बलिदान देना पड़ेगा, उसके लिए तैयार हैं। उन्होंने गौमाता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि सनातन परंपरा में देवताओं और गुरुओं का विशेष स्थान है, लेकिन इसके बावजूद घर में पहली रोटी गौमाता के लिए निकाली जाती है। यह परंपरा गौमाता के प्रति श्रद्धा और उनके महत्व को सहज रूप से दर्शाती है।

‘गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित नहीं करना सरकार के पतन का कारण बनेगा

इस अवसर पर जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री श्री 1008 स्वामी योगेश्वराचार्य ने कहा कि यदि गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित नहीं किया गया, तो यह निश्चित रूप से सरकार के पतन का कारण बनेगा।

कार्यक्रम के दौरान संतों ने धर्म, सनातन परंपराओं और गौ-रक्षा के विषयों पर एकजुटता प्रदर्शित करते हुए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के प्रयासों को समर्थन देने की प्रतिबद्धता दोहराई।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी