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हिंदू संस्कृति के मूल मंत्र को समझकर उसके अनुरूप करें कार्य : मिलिंद परांडे

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हिंदू संस्कृति के मूल मंत्र को समझकर उसके अनुरूप करें कार्य : मिलिंद परांडे


—सामाजिक समरसता भारतीय जीवन का आधार, भेदभाव और अस्पृश्यता को मिटाकर राष्ट्र को एकसूत्र में बांधने का आह्वान

वाराणसी,05 नवंबर (हि.स.)। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संगठन महामंत्री मिलिंद परांडे ने कहा कि सामाजिक समरसता भारतीय जीवन का आधार है। हमारे वैदिक ऋषियों ने सदियों पहले ही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का संदेश दिया था। भेदभाव और अस्पृश्यता भारतीय समाज पर कलंक हैं। इन्हें समाप्त कर समूचे राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हिंदू संस्कृति के मूल मंत्र को समझते हुए हमें उसी के अनुरूप अपने आचरण और कार्यों को दिशा देनी चाहिए।

मिलिंद परांडे गुरुवार को सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में अखिल भारतीय संत समिति एवं गंगा महासभा की ओर से आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद के अंतिम दिन समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं और आदर्शों के बल पर अनादिकाल से अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।

समापन सत्र में अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं कैवल्य पीठाधीश्वर जगद्गुरु अविचल देवाचार्य ने कहा कि प्राचीन काल के ऋषि-मुनि भी अपने समय के वैज्ञानिक थे। गंगा जल की महत्ता और उसके जीवनदायी गुणों को आज भी विज्ञान स्वीकार कर रहा है। उन्होंने जल संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि वर्षा के पानी की एक-एक बूंद को जमीन और तालाबों में संरक्षित करने की व्यवस्था होनी चाहिए। इसके लिए प्रभावी जल प्रबंधन बेहद जरूरी है।

गंगा महासभा के उपाध्यक्ष प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने महामना मदन मोहन मालवीय द्वारा गंगा संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश की गुलामी के दौर में महामना ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही गंगा के अविरल प्रवाह को बनाए रखने का भी संकल्प लिया था। वर्ष 1916 में विश्वविद्यालय का विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने हरिद्वार जाकर ब्रिटिश सरकार से गंगाजल को लेकर समझौता किया था। इस समझौते का उद्देश्य गोमुख से गंगासागर तक गंगा के अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करना था।

कला और संस्कृति की आड़ में अपसंस्कृति पर जताई चिंता

संस्कृति संसद के एक अन्य सत्र में ‘कला-संस्कृति की आड़ में अपसंस्कृति : ग्लैमर की चकाचौंध में अंधे हुए जिम्मेदार’ विषय पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी के अध्यक्ष डॉ. सुनील विश्वकर्मा ने कहा कि कला संस्कृति को अपने कंधों पर लेकर आगे बढ़ती है। संस्कृति कभी समाप्त नहीं होती, जबकि सभ्यताएं समय के साथ मिट जाती हैं। उन्होंने चिंता जताई कि अपसंस्कृति के प्रभाव में हिंदू देवी-देवताओं का चित्रण प्राचीन मान्यताओं और शास्त्रीय परंपराओं के विपरीत किया जा रहा है। देवी-देवताओं का चित्रण प्राचीन शास्त्रों में वर्णित स्वरूप और मान्यताओं के अनुरूप ही होना चाहिए।

स्वामी आशुतोषानंद गिरि ने कहा कि शास्त्रों पर शास्त्रार्थ उनकी समकालीन प्रासंगिकता और विस्तार का माध्यम है। बदलते समय के अनुरूप व्यापक विमर्श के बाद आवश्यक संशोधनों पर भी विचार किया जाना चाहिए। ‘सेव कल्चर सेव भारत’ के संस्थापक उदय माहूरकर ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए सतर्क रहने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से भारतीय संस्कृति को विकृत करने वाली सामग्री के प्रचार-प्रसार पर समाज को सजग रहना होगा।

—भारतीय सभ्यता और आनुवंशिकी पर भी हुई चर्चा

बीएचयू के जीव विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने विभिन्न ग्रंथों में मानव शरीर में विद्यमान ऊर्जा के जिन स्रोतों का उल्लेख किया है, उनके संदर्भ में आधुनिक विज्ञान भी अध्ययन कर रहा है। उन्होंने भारतीय समाज की वंश परंपरा और आनुवंशिक विविधता पर चर्चा करते हुए कहा कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बीच आनुवंशिक संबंधों को समझना महत्वपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि अंग्रेजी शासन के दौरान भारतीय समाज को भाषा, लिंग, पंथ और क्षेत्र के आधार पर बांटने के प्रयास किए गए। वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव ने ‘दिमागी नक्सल’ विषय पर अपने विचार रखे। काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अत्रि भारद्वाज ने कहा कि कला भी संस्कृति की तरह समाज को लंबे समय तक जोड़ने का कार्य करती है। चित्रकला, मूर्तिकला, कविता, साहित्य और पेंटिंग के माध्यम से धर्म एवं संस्कृति के संदेश पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं। इससे सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को मजबूती मिलती है। सम्मेलन को आईआईटी बीएचयू के प्रो. वी. रामनाथन, पद्मश्री प्रो. कमलाकर त्रिपाठी और गंगा महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष एसके मिश्रा ने भी संबोधित किया।

—2000 से अधिक संतों और धर्माचार्यों ने लिया भाग

समापन सत्र में आयोजन समिति के अध्यक्ष सुनील देवधर और चकिया विधायक कैलाश आचार्य ने देश के विभिन्न हिस्सों से आए मीडियाकर्मियों एवं प्रतिनिधियों को सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन गंगा महासभा के संगठन महामंत्री गोविंद शर्मा ने किया। शांति गीत के साथ समापन सत्र संपन्न हुआ। तीन दिवसीय संस्कृति संसद में देश के सभी राज्यों से विभिन्न अखाड़ों एवं प्रमुख पंथों के धर्माचार्यों, संतों और बुद्धिजीवियों ने सहभागिता की। आयोजन में 2000 से अधिक संतों ने भाग लिया।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी