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सनातन धर्म को षड्यंत्रों से बचाएगा संत समाज : रविंद्रपुरी महाराज

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सनातन धर्म को षड्यंत्रों से बचाएगा संत समाज : रविंद्रपुरी महाराज


सनातन धर्म को षड्यंत्रों से बचाएगा संत समाज : रविंद्रपुरी महाराज


काशी में तीन दिवसीय संस्कृति संसद की हुई शुरूआत

वाराणसी, 03 नवम्बर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में मंगलवार को सिगरा स्थित रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में गंगा महासभा और अखिल भारतीय संत समिति के तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद की शुरूआत हुई। संस्कृति संसद के उद्घाटन सत्र में अध्यक्षता करते हुए ज्योतिषपीठाधीश्वर स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती ने कहा कि सनातन धर्म एवं संस्कृति को धर्म विरोधियों के हमलों से बचाने के लिए संस्कृति संसद का आयोजन आवश्यक है। गोमाता भारतीय संस्कृति की आधार हैं, इसलिए गोमाता की रक्षा के लिए कानून बनना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में गो, गंगा, गीता महत्वपूर्ण है। गो अर्थात गाय हमारी संस्कृति का आधार है, इसकी रक्षा के लिए 1962 में करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में आंदोलन हुआ। तत्कालीन सरकार की हिंसा के कारण करपात्री जी की एक आंख की रोशनी चली गई, किसी तरह उनके प्राण बचे। वर्तमान में गोमाता की रक्षा के लिए कानून होने चाहिए।

इस अवसर पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष रविंद्रपुरी महाराज ने कहा कि भारत में संत समाज ने सदा ही धर्म की रक्षा की है और आगे भी सनातन धर्म की रक्षा करेगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान में हमारा प्रयास था कि संपूर्ण भारत का सन्त समाज एक मंच पर उपस्थित हो। वह कार्य संस्कृति संसद के माध्यम से पूरा हुआ और इसमें पूरे देश के सभी पंथों के सन्तों की भागीदारी है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति को सन्त ही बचा सकते हैं और अतीत में सन्तों ने ही भारतीय संस्कृति की रक्षा की।

अखिल भारतीय सन्त समिति एवं गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामन्त्री स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि वर्तमान में अनेक षड्यंत्र हो रहे हैं। इस समय भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के खिलाफ संघर्ष का अखाड़ा दिल्ली बन गई है। कुछ व्यक्ति एवं संगठन लोकतंत्र में जनता नहीं जंतर-मंतर के रास्ते सत्ता बदलने का कुचक्र कर रहे हैं। यह सब इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें सनातन और संस्कृति की रक्षा के लिए काम करने वाली सरकार अच्छी नहीं लग रही है। उन्होंने कहा कि सन्तों को इस सच्चाई को समझना चाहिए तथा संस्कृति एवं धर्म विरोधी शक्तियों के विरुद्ध कार्य करना चाहिए। सम्मेलन में विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षक दिनेश ने कहा कि पूर्व की सरकारों ने ऐसे-ऐसे कानून बनाए, जिससे कि भारतीय हिंदू समाज और परिवार की भावना तार-तार हो रही है। उन्होंने कहा कि यूजीसी कानून, समाज को जातियों में बांटने वाले कानून, लिव-इन-रिलेशनशिप, आदि कानूनों के साथ-साथ पिता की संपत्ति में बालिकाओं की भागीदारी से उपजा भाई-बहन विवाद मुख्य है, जिस पर हम आगे निर्णय लेंगे तथा इन कानूनों को बदलने की जरूरत है। परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक ने कहा कि वर्तमान में हिंदुओं की संख्या घट रही है तथा मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या एक नया असंतुलन पैदा कर रही है। उन्होंने कहा कि धर्मांतरण की चुनौती आज भी बढ़ी है। वर्तमान समय में मंचों से राम, शिव एवं कृष्ण पर भी आपत्तिजनक विचार व्यक्त किए जा रहे हैं। इसलिए आवश्यक है कि समाज में सन्त समुदाय लोक जागरण करें, जिससे कि भारत में सनातन धर्म एवं संस्कृति की रक्षा हो सकें। कथावाचक आचार्य सुधांशु महाराज ने कहा कि वर्तमान में बहुत सजग रहकर सनातन धर्म के लिए कार्य करना है।

आयोजन समिति के अध्यक्ष सुनील देवधर ने कहा कि 1914 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध लोकसभा चुनाव में लड़ रहे अरविंद केजरीवाल के समर्थन में वामपंथी साहित्यकार एवं कलाकार तथा राष्ट्र विरोधी शक्तियों ने काशी में अपना षड्यंत्र प्रारंभ किया। उन्हीं राष्ट्र विरोधी शक्तियों के प्रयासों को विफल करने के लिए संस्कृति संसद की शुरुआत हुई और वह वर्तमान में भी जारी है। उन्होंने कहा कि आज संस्कृति संसद प्रासंगिता और भी बढ़ी है, क्योंकि देश में भारतीय संस्कृति एवं धर्म पर हमले किए जा रहे हैं और जंतर-मंतर उनका केंद्र बन गया था।

आयोजन का शुभारंभ दीप प्रज्जवल के साथ हुआ। मंचासीन संतों का माल्यार्पण कर स्वागत सुनील देवधर, प्रो. अरविंद जोशी, प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन सन्त समिति के कोषाध्यक्ष जनार्दन हरि जी ने किया। इस दौरान मंच पर अध्यक्ष भारतीय सन्त समिति के अध्यक्ष कैवल्य पीठाधीश्वर जगद्गुरु अविचलदेवाचार्य महाराज, विश्व हिन्दू परिषद् के अंतर्राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय , सन्त समिति के संयुक्त महामन्त्री महामंडलेश्वर मनमोहन दास ‘राधे-रोध बाबा’, काशी विद्वत् परिषद् के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी, काशी विद्वत् परिषद् के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. रामचंद्र पांडेय, काशी विद्वत परिषद् के महामन्त्री डाॅ. रामनारायण द्विवेदी जी आदि उपस्थित थे। संस्कृति संसद में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गोवा, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश के सभी प्रमुख पंथों के लगभग 1500 संत, महामंडलेश्वर, आचार्य सम्मिलित हुए। सत्र के अंत में संस्कृति पर्व पत्रिका का लोकार्पण किया गया।

देश-विदेश के कलाकारों की कलाकृतियां बनीं आकर्षण

संस्कृति संसद में आयोजित कला एवं छायाचित्र प्रदर्शनी में देश-विदेश के कलाकारों की कलाकृतियां आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। पद्मश्री दुलारी देवी की मधुबनी पेंटिंग और पद्मश्री श्याम शर्मा की हनुमान जी की कलाकृति विशेष रूप से सराही जा रही हैं।

प्रदर्शनी में काशी के घाटों, महादेव के विभिन्न स्वरूपों, महाकुंभ और धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत पर आधारित चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। थाईलैंड, अमेरिका और तुर्की के कलाकारों के छायाचित्र भी प्रदर्शनी का हिस्सा हैं। वहीं, रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर के प्रवेश द्वार और परिसर में बनाई गई आकर्षक रंगोलियां भारतीय संस्कृति और परंपराओं की झलक प्रस्तुत कर रही हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी