home page

समाज अपने दैनिक जीवन में भारत शब्द के प्रयोग को स्वीकार करे : डॉ मनमोहन वैद्य

 | 
समाज अपने दैनिक जीवन में भारत शब्द के प्रयोग को स्वीकार करे : डॉ मनमोहन वैद्य


समाज अपने दैनिक जीवन में भारत शब्द के प्रयोग को स्वीकार करे : डॉ मनमोहन वैद्य


—प्रमुख जन संवाद संगोष्ठी में बोले आरएसएस के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य

वाराणसी, 10 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सम्पूर्ण समाज का संगठन है, सम्पूर्ण समाज एकात्म भाव से एकत्र हो यही संघ की भावना है। संघ भारत का 'स्व' है। यह बातें गुरूवार को संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ मनमोहन वैद्य ने कही। अवसर रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, काशी महानगर की ओर से केन्द्रीय कारागार मार्ग स्थित सनबीम वरुणा के सभागार में आयोजित प्रमुख जन संवाद संगोष्ठी का।

संगोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता डॉ मनमोहन वैद्य ने कहा कि हमारी पहचान आध्यात्मिक है और इसी का नाम हिन्दुत्व है। आरएसएस समाज जागरण, व्यवस्था परिवर्तन एवं व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है। इस कार्य में समाज के प्रत्येक जन मानस की सहभागिता आवश्यक है। हम यह नहीं कह सकते कि हमें समय की कमी है। क्योंकि जिस प्रकार मछली पानी में रहती है, उसी प्रकार हम समय के मध्य में रहते हैं। धर्म की व्याख्या करते हुए डॉ वैद्य ने कहा कि भारत में धर्म 'रिलीजन' शब्द का अर्थ नहीं है, समाज को देना चैरिटी है और समाज को वापस लौटाना यह धर्म है। धर्म बांटता नहीं है अपितु बांधता है। एक घर में पांच लोगों का 'रिलीजन' अलग-अलग हो सकता है। भारत में 'रिलीजन' का अर्थ उपासना हो सकता है। विविधता में एकता, अनेकता में ऐक्य देखना यही भारत का अन्तर्निहित धर्म है। व्यक्ति धर्म प्रवण बने और समाज धर्म आधारित हो तब राष्ट्र बलवान होगा। प्राचीन भारत के वैभव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ल्ड हिस्ट्री आफ इकॉनामिक्स पुस्तक में उल्लेखित है कि ईस्वी सन् 1 से 1700 तक विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 33 प्रतिशत रही। चमड़ा उद्योग, धातु उद्योग, इत्र उद्योग, वस्त्र उद्योग में भारत विश्व में प्रमुख स्थान रखता था। महिलाएं घरों में उद्योग सम्भालती थी एवं पुरुष वर्ग वस्तु बेचने बाहर जाते थे। घर की सम्पदा का नियंत्रण घर की गृहणी के हाथ में था इसी कारण महिलाएं गृह लक्ष्मी कही जाती थी। के0एम0 मुंशी द्वारा लिखित पिलग्रिम टू फ्रिडम पुस्तक के अनुसार भारत का निर्यात ज्यादा था, आयात कम था। भारत के मन्दिर समाज के समृद्धि का केन्द्र थे, इस कारण स्वर्ण भण्डार मन्दिरों में रहता था।

भारत में महिलाओं की स्थिति का उल्लेख कर डॉ वैद्य ने कहा कि भारत में महिलाओं की स्थिति आदिकाल से पुरुषों के समकक्ष रही है। स्वतंत्रता के बाद महिलाओं के मताधिकार पर बिना चर्चा अधिकार दे देना उनके सामाजिक महत्व को दर्शाता है।

—समाज अपने दैनिक जीवन में भारत शब्द के प्रयोग को स्वीकार करे

जिज्ञासा समाधान के क्रम में पूछे गये सवाल पर उन्होंने कहा कि भारत दुनिया में अकेला राष्ट्र है जो अपने दो नामों के साथ आगे बढ़ रहा है। जबकि बर्मा ने स्वतंत्रता के पश्चात अपना नाम म्यांमार स्वीकार कर लिया। हम कौन है जब तक यह तय नहीं होगा हम अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर सकते। स्व को नकारने की आदत प्रगतिशील बौद्धिकता के नाम पर भारत में स्वीकार की जाती रही है। परन्तु वर्तमान में वातावरण बदला है। देश की राष्ट्रपति के आधिकारिक पत्र पर 'इण्डिया' के स्थान पर 'भारत' का प्रयोग हो रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि समाज भारत शब्द के प्रयोग को अपने दैनिक जीवन में स्वीकार करे तब हमे 'इण्डिया दैट इज भारत' नहीं कहना होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए एक निजी विद्यालय समूह के निदेशक दीपक मधोक ने कहा कि शिक्षा राष्ट्र का प्रमुख रक्षक है। डॉ0 भीमराव अम्बेडकर ने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा। शिक्षा द्वारा भारत की सेवा ही व्यक्ति का एकमेव ध्येय होना चाहिए। कार्यक्रम के प्रारम्भ में निवेदिता शिक्षा सदन की छात्राओं ने राष्ट्रगीत वन्देमातरम प्रस्तुत किया। संघ के काशी विभाग के विभाग संघचालक प्रो. जयप्रकाश लाल सहित मंचस्थ अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन किया। अतिथियों का स्वागत डॉ चारुचन्द्र राम त्रिपाठी ने किया। विषय प्रस्तावना काशी प्रान्त के सह प्रान्त कार्यवाह प्रो. राकेश तिवारी ने किया। संचालन डॉ हरेन्द्र राय एवं धन्यवाद ज्ञापन आशुतोष ने किया। प्रमुख जन संवाद संगोष्ठी में प्रमुख रूप से काशी प्रान्त प्रचारक रमेश, विभाग प्रचारक नितिन, रामानुज सिंह, डॉ0 आनन्द प्रभा, यूपी कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ0रमेश सिंह, डॉ0 शान्तनु त्रिपाठी, डॉ. चन्द्रमणि सिंह, डॉ0 श्रीप्रकाश, डॉ0विश्वेश्वर, डा0 प्रियंका तिवारी,डॉ अम्बरीश राय आदि मौजूद रहे।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी