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मुथुस्वामी दीक्षितर ने आध्यात्मिक दर्शन को संगीत परम्परा में जागृत किया : वी० एस० सुब्रमण्यम

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मुथुस्वामी दीक्षितर ने आध्यात्मिक दर्शन को संगीत परम्परा में जागृत किया : वी० एस० सुब्रमण्यम


वाराणसी, 16 मार्च (हि.स.)। कर्नाटक संगीत परम्परा के विद्वान मुथुस्वामी दीक्षितर की 250वीं जयंती के अवसर पर सोमवार को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के क्षेत्रीय केंद्र वाराणसी द्वारा स्मृति-व्याख्यान का आयोजन किया गया। “काशी श्रद्धांजलि” विषयक इस कार्यक्रम में कर्नाटक संगीत परंपरा में दीक्षितर के योगदान को स्मरण करते हुए उनके आध्यात्मिक एवं संगीत दर्शन पर विस्तृत चर्चा की गई। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में वी. रामनाथन तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में वी. एस. सुब्रमण्यम उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता के. शशि कुमार ने की।

कला केंद्र की परंपरा के अनुसार कार्यक्रम का शुभारंभ बृहस्पति पाण्डेय के मंगलाचरण से हुआ। क्षेत्रीय निदेशक अभिजित दीक्षित ने वाचिक स्वागत करते हुए कहा कि “अपरा विद्या, परा विद्या से समर्थित होती है और संगीत इसी भाव का सशक्त माध्यम है, जो नृत्य, वाद्य और गायन तीनों में प्रतिष्ठित है।” विशिष्ट अतिथि वी. एस. सुब्रमण्यम ने अपने वक्तव्य में मुथुस्वामी दीक्षितर के जीवन और उनकी साधना से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने आध्यात्मिक दर्शन को कर्नाटक संगीत परंपरा में जीवंत रूप से स्थापित किया। मुख्य वक्ता वी. रामनाथन ने दीक्षितर की संगीत साधना के सूक्ष्म आयामों पर प्रकाश डालते हुए भारतीय भाषाई और सांस्कृतिक परंपराओं के अंतर्संबंधों को भी रेखांकित किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में के. शशि कुमार ने भारतीय संगीत में वाद्य और वाक्पक्ष की परंपरा के साथ नवग्रह साधना से जुड़ी गायन परंपरा को आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में त्रिलोचन प्रधान ने धन्यवाद ज्ञापन किया, जबकि संचालन रजनीकांत त्रिपाठी ने किया।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी