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मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी तीर्थ पर चलाया स्वच्छता अभियान

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मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी तीर्थ पर चलाया स्वच्छता अभियान


वाराणसी, 30 मई (हि, स.)। उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में शनिवार को नमामि गंगे के स्वयं सेवकों ने मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी तीर्थ पर स्वच्छता का अलख जगाया। तीर्थ कुंड पर स्वच्छता अभियान में श्रमदान कर लोगों को भी इसके लिए जागरूक किया।

अभियान में शामिल गंगा सेवक राजेश शुक्ल ने श्रद्धालु तीर्थ यात्रियों को बताया कि सनातन शास्त्रों में धर्म नगरी काशी और मणिकर्णिका चक्रपुष्करिणी तीर्थ का विशेष उल्लेख है। इसे बाबा विश्वनाथ की नगरी भी कहा जाता है। चिरकाल में काशी भगवान विष्णु का निवास स्थान था। कालांतर में काशी आगमन के चलते भगवान शिव को ब्रह्म वध से मुक्ति मिली थी। उस समय भगवान शिव ने विष्णु जी से काशी को निवास हेतु मांग लिया। भगवान विष्णु, शिव जी को मना नहीं कर सके। तब से काशी को बाबा की नगरी कहा जाता है।

काशी अपनी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा की नगरी काशी तीर्थ यात्रा के लिए आते हैं। काशी में कई प्रकार की यात्राएं की जाती हैं। इनमें पंचकोशी यात्रा बहुत प्रसिद्ध है। पंचकोशी यात्रा की शुरुआत त्रेता युग से हुई है। शास्त्रों में निहित है कि त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने पिता दशरथ को श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए पंचकोशी यात्रा की थी। धार्मिक मत है कि राजा दशरथ के बाणों से श्रवण कुमार घायल हो गए थे। अनजाने में किए गए वार से श्रवण कुमार की मृत्यु हो गई थी। उस समय श्रवण कुमार के माता-पिता ने राजा दशरथ को पुत्र वियोग में तड़प-तड़प कर मरने का श्राप दिया था। कालांतर में भगवान राम के वनवास के दौरान दशरथ की मृत्यु हुई थी। इस श्राप से पिता को मुक्ति दिलाने के लिए भगवान राम ने पंचकोशी यात्रा की थी।

पंचकोशी यात्रा करने से साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। काशी की पौराणिक और आध्यात्मिक पंचकोशी यात्रा की शुरुआत (संकल्प) मणिकर्णिका घाट स्थित मणिकर्णिका कुंड में पवित्र स्नान और पूजा-अर्चना के साथ ही होती है। भक्त मणिकर्णिका कुंड में डुबकी लगाकर यात्रा का संकल्प लेते हैं। यह लगभग 88 किलोमीटर लंबी यात्रा होती है, जिसे पूरा करने से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) और ब्रह्मांड की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त होता है। पंचकोशी यात्रा के पांच मुख्य पड़ाव हैं। यह यात्रा पांच दिनों तक चलती है। इसमें भक्त हर दिन एक पड़ाव की यात्रा करते हैं। प्रथम पड़ाव कर्दमेश्वर महादेव (कंदवा), द्वितीय पड़ाव भीमचंडी देवी, तृतीय पड़ाव रामेश्वर महादेव, चतुर्थ पड़ाव शिवपुर पांचों पांडवा व पंचम पड़ाव कपिलधारा होता है। यात्रा का समापन पांचवे पड़ाव (कपिलधारा) के बाद भक्त वापस मणिकर्णिका घाट लौटते हैं।

इसके बाद साक्षी विनायक (गणेश जी) के दर्शन कर यह माना जाता है कि आपकी यात्रा पूर्ण हो गई है। अंत में काशी विश्वनाथ और काल भैरव का दर्शन कर यह यात्रा संपन्न होती है। राजेश शुक्ला ने कहा कि आस्था, अनुशासन और सनातन संस्कृति की अनुपम छटा बिखेरती यह पंचकोशी यात्रा काशी की जीवंत धार्मिक विरासत का प्रतीक है। देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा से अभिभूत करती है।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी