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महाश्मशान नाथ के त्रिदिवसीय श्रृंगार महोत्सव में नगर वधुओं ने नृत्य से लगाई हाजिरी

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महाश्मशान नाथ के त्रिदिवसीय श्रृंगार महोत्सव में नगर वधुओं ने नृत्य से लगाई हाजिरी


महाश्मशान नाथ के त्रिदिवसीय श्रृंगार महोत्सव में नगर वधुओं ने नृत्य से लगाई हाजिरी


—धधकती चिताओं के समीप महाश्मशान नाथ मंदिर में घुंघरुओं की खनक,बाबा का तांत्रोक्त विधि से पूजन अभिषेक

वाराणसी, 25 मार्च (हि.स.)। वांसतिक चैत्र नवरात्र के सातवें दिन बुधवार शाम उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी के मणिकर्णिकाघाट स्थित महाश्मशान नाथ के त्रिदिवसीय श्रृंगार महोत्सव के अंतिम दिन दरबार में नगर वधुओं ने नृत्य (नृत्यांजलि) से हाजिरी लगाई। घाट पर चल रहे निर्माण कार्यो के चलते बाबा मशाननाथ के मंदिर में ही नगर वधुओं ने नृत्याजंलि अर्पित की। धधकती चिताओं के समीप मंदिर में नगर वधुओं ने अपने गायन व नृत्य के माध्यम से परम्परागत भावांजली बाबा को समर्पित की और मन्नत मांगी कि बाबा अगला जन्म सुधारे, भावपूर्ण राग विराग का दृश्य देख लोग भावुक नजर आए। नगर वधुओं की घुंघरुओं की खनक के बीच शिवभजनों की प्रस्तुति और नृत्य देखने के लिए युवा मंदिर में जमे रहे।

बताते चले मोक्षतीर्थ महाश्मशान मणिकर्णिकाघाट पर पर चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती। देश के दूर-दूर से लोग यहां अपनों के अंतिम संस्कार के लिए आते हैं। मान्यता है कि काशी के इस महाश्मशान पर खुद बाबा विश्वनाथ मृतक के कानों में तारक मन्त्र बोलकर उसे मुक्ति देते है। महोत्सव में बाबा महाश्मशान नाथ एवं माता मशान काली का सांयकाल पंचमकार का भोग लगाकर तांत्रोक्त विधि से भव्य आरती की गई। काशी में मान्यता है कि बाबा (महादेव) को प्रसन्न करने के लिये शक्ति ने योगिनी रूप धरा था और आज बाबा का प्रांगण रजनी गंधा,गुलाब व अन्य सुगंधित फूलों से सजाया गया था। बाबा के विग्रह की आरती के पश्चात नगर वधुओं ने अपने गायन व नृत्य के माध्यम से परम्परागत भावांजली प्रस्तुत की।

बाबा के श्रृंगार महोत्सव को लेकर मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर ने बताया कि परम्परा सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है। मणिकर्णिका घाट पर विराजित बाबा मसाननाथ को स्वयंभू कहा जाता है। काशी में कहा जाता हैं कि राजा मानसिंह ने जब बाबा मशाननाथ के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। तब मंदिर में संगीत के लिए कोई भी कलाकार आने को तैयार नहीं हुआ था। हिन्दू धर्म में हर पूजन या शुभ कार्य में संगीत जरुर होता है। इसी कार्य को पूर्ण करने के लिए जब कोई तैयार नहीं हुआ तो राजा मानसिंह काफी दुःखी हुए, और यह संदेश उस जमाने में धीरे-धीरे पूरे नगर में फैलते हुए काशी के नगर वधुओं तक भी जा पहुंचा। तब नगर वधुओं ने डरते —डरते अपना संदेश राजा मानसिंह तक भिजवाया कि यह मौका अगर उन्हें मिलता हैं तो काशी की सभी नगर वधुएं अपने आराध्य संगीत के जनक नटराज महाश्मसानेश्वर को अपनी भावाजंली प्रस्तुत कर सकती है। यह संदेश पा कर राजा मानसिंह काफी प्रसन्न हुए और ससम्मान नगर वधुओं को आमंत्रित किया गया । तब से यह परम्परा शुरू हुई। वहीं,दूसरी तरफ नगर वधुओं के मन मे यह विचार आया की अगर वह इस परम्परा को निरन्तर बढ़ाती हैं तो उनके इस नारकीय जीवन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा । फिर क्या था आज सैकड़ों वर्ष बाद भी यह परम्परा जीवित है। बिना बुलाये यह नगर वधुएं कहीं भी रहे चैत्र नवरात्र के सप्तमी को काशी के मणिकर्णिकाघाट पर स्वयं आ जाती है। बाबा का रात्रि पर्यन्त चलने वाला जागरण प्रारंभ हुआ जो की जलती चिताओं के पास मंदिर में अपने परम्परागत स्थान से प्रारंभ हुआ। अतिथियों का स्वागत मंदिर व्यवस्थापक गुलशन कपूर एवं उपाध्यक्ष संजय प्रसाद गुप्ता ने किया ।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी