संतान की उम्मीद में लाखों दंपतियाें ने लोलार्क कुंड में लगाई आस्था की डुबकी
- आस्थावानों ने कुंड में स्नान के दौरान परम्परानुसार धारण वस्त्र वहीं छोड़े, एक सब्जी का भी किया त्याग
वाराणसी, 17 सितंबर (हि.स.)। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर गुरूवार को उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी के भदैनी स्थित लोलार्क कुंड में लाखों आस्थावानों ने संतान प्राप्ति की कामना काे लेकर पूरी आस्था के साथ तीन डुबकी लगाई। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच बुधवार से ही लाखों दंपति कुंड में स्नान करने के लिए कतारबद्ध हो गए थे। भोर से ही कुंड में स्नान का सिलसिला शुरू हाे गया और 10 बजे तक लाखों दंपतियों ने कुंड में एक दूसरे का हाथ थामकर डुबकी लगाई।
संकरी गली में स्थित इस कुंड तक पहुंचने के लिए स्नान करने वाले पुरुषों और महिलाओं की डेढ़ से दो किलोमीटर लम्बी कतार लगी रही। इसके पहले मध्यरात्रि 12 बजे कुंड की पूजन-आरती की गई। इस दौरान पूरा क्षेत्र डमरुओं की निनाद से गूंज उठा। कुंड के पूजनोपरांत आस्था का स्नान शुरू हुआ, जो आज रात तक चलता रहेगा। लोलार्क कुंड के निकट और इसके मुख्य मार्ग के दोनों ओर दूर तक बैरिकेडिंग की गई हैं। कुंड के आस-पास स्थान की कमी के कारण 100-100 लोगों के समूह को बारी-बारी से स्नान के लिए छोड़ जा रहा था।
एक समूह के दंपतियों के स्नान कर कुंड से निकलने के बाद ही दूसरे समूह को आगे जाने दिया जा रहा था। कुंड में एक ओर स्नान के लिए प्रवेश तो दूसरे ओर निकास की व्यवस्था बनायी गयी है। स्नान करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से आए लोगों को अपनी बारी के लिए घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ी।
लोलार्क कुंड में स्नान के दौरान परम्परानुसार दंपतियों ने जो वस्त्र धारण किए थे, उन्हें वहीं छोड़ दिया। स्नान के दौरान ही दंपतियों ने एक-एक सब्जी का त्यागभी किया। स्नान व सब्जी या फल दान के बाद दंपतियों ने निकट स्थित लोलार्केश्वर महादेव का दर्शन भी किए।
काशी में मान्यता है कि संतान प्राप्ति की कामना से लोलार्क कुंड में स्नान करने वालों को भगवान सूर्य के प्रति आस्था दिखाते हुए किसी एक सब्जी का त्याग कर देना चाहिए। उसका पालन करते हुए बहुतेरे लोगों ने स्नान के उपरांत लौकी और कोहड़ा जैसी सब्जियां भी कुंड में प्रवाहित की। मान्यता है कि कुंड में छोड़ा गया उक्त फल विशेष संतान का प्रतीक स्वरूप होता है जिसे दंपति जीवन भर नहीं खाते। उधर, पूर्व के वर्षों में लोलार्क कुंड में स्नान के बाद जिन दंपतियों को संतान की प्राप्ति हुई है, उन्होंने मनोकामना पूर्ण होने की खुशी में बाबा के नाम पर कड़ाही चढ़ाने की परंपरा जगन्नाथ मंदिर परिसर में पूरी की। उक्त बच्चों का मुंडन संस्कार भी वहीं किया।
लोलार्केश्वर महादेव के पुजारी रमेश कुमार पांडेय ने बताया कि दंपति एक साथ कुंड के पवित्र जल में तीन बार डुबकी लगाते हैं। स्नान संपन्न होते ही कुंड में एक फल समर्पित किया जाता है और भीगे वस्त्र वहीं छोड़ दिए जाते हैं। मान्यता है कि इससे पूर्व के समस्त कष्ट और ग्रह-बाधाएं छूट जाती हैं। इसके पश्चात श्रद्धालु लोलार्केश्वर महादेव की विधिवत पूजा कर वंश वृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं।
सूनी गोद में गूंजती है किलकारी
लोलार्क कुंड की धार्मिक मान्यता है कि यहां स्नान करने से निसंतान दंपतियों की सूनी गोद भर जाती है। 50 फीट गहरे और 15 फीट चौड़े इस पवित्र कुंड में तीन ओर से सीढ़ियां हैं, जो इसे एक खड़े कुएं का स्वरूप देती हैं। आस्था और विश्वास से जुड़े इस कुंड में हर साल हजारों दंपति संतान प्राप्ति की कामना से आते हैं। काशी के काशीखंड में वर्णित है कि लोलार्क षष्ठी के दिन लोलार्क कुंड में स्नान करने से संतान सुख प्राप्त होता है और शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। दंपतियों द्वारा कुंड में तीन डुबकी लगाने के बाद लोलार्केश्वर महादेव की पूजा भी विशेष रूप से की जाती है।
अघोरपीठ क्रीं कुंड पर भी लगा श्रद्धालुओं का तांता
लोलार्क षष्ठी पर रविंद्रपुरी स्थित क्रीं कुंड पर भी श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। स्नान और दर्शन-पूजन के लिए दूर-दराज से पहुंचे भक्तों की मौजूदगी से पूरा परिसर खचाखच भर गया। बाबा कीनाराम के जन्मोत्सव (कीनाराम षष्ठी) के उपलक्ष्य में परिसर में श्रमदान और स्वच्छता अभियान भी चलाया गया।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

